
नगर निगम आयुक्त धुरंधर दिलीप कुमार यादव कटघरे में
कटनी में अडानी पर सख़्ती, इंदौर में 16 मौतों पर ख़ामोशी!
नगर निगम आयुक्त दिलीप कुमार यादव कटघरे में
इंदौर | विशेष खोज रिपोर्ट
भगीरथपुरा की सँकरी गलियों में आज भी डर पसरा है।
गंदा पानी पी चुके लोग अब प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर बड़े अस्पतालों तक भटक रहे हैं। OPD खचाखच भरी है , बुज़ुर्ग, महिलाएँ, बच्चे घंटों लाइन में खड़े हैं।
कई घरों में एक ही तस्वीर है,
बीमार परिजन, इलाज की फाइलें, दवाइयों के बिल और हर बूंद पानी पर शक।
कुछ परिवार इलाज और कर्ज़ के बीच टूट चुके हैं,
तो कुछ के अपने अब भी ICU में ज़िंदगी से जूझ रहे हैं।
और शहर गिन चुका है 16 लाशें।
कार्रवाई हुई… लेकिन सवालों के बाद
जांच बढ़ी, दबाव बना तो
IAS रोहित सिसोनिया हटाए गए, ट्रांसफर ऑर्डर निकले।
सूत्रों की मानें तो रोहित सिसोनिया को सिस्टम में “नॉन-नेगोशिएबल अफसर” माना जाता था।
लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात
नगर निगम आयुक्त दिलीप कुमार यादव पर कार्रवाई सबसे आखिर में हुई,
वह भी तब, जब मामला राष्ट्रीय स्तर पर गूंज चुका था।
‘दिलीप’ नाम का अर्थ और इंदौर की हकीकत
कहा जाता है, दिलीप वह होता है जो न्यायप्रिय हो,
कर्तव्यनिष्ठ हो,
संकट में जनता के आगे खड़ा हो। लेकिन इंदौर के भगीरथपुरा में जब पानी में ज़हर घुला,
घरों में चूल्हे बुझे
और 16 अर्थियाँ उठीं
तो नगर निगम का ‘राजा’ बहरा नज़र आया।

कटनी फाइल: जहाँ दिलीप यादव अडानी पर सख़्त थे
यहीं से कहानी और पेचीदा हो जाती है। कटनी जिले में कलेक्टर रहते हुए
दिलीप कुमार यादव ने अडानी समूह की ACC (Adani Cement) कंपनी पर
₹23 करोड़ 72 लाख से अधिक का जुर्माना ठोका था।
रिपोर्ट में आरोप था कि
महगांव और अमहटा गांवों में
कोयला, बॉक्साइट और लेटराइट का अवैध भंडारण किया गया। लेकिन सवाल अब भी ज़िंदा हैं …
क्या यह जुर्माना वास्तव में वसूला गया?
या मामला फाइलों में ठंडा पड़ गया?
नोटिस के बाद कंपनी पर दबाव बढ़ा या राहत मिली?
और सबसे बड़ा सवाल…
कटनी में कॉरपोरेट पर सख़्ती दिखाने वाले दिलीप यादव
इंदौर में जन-मौतों पर जवाबदेही तय करने में इतने धीमे क्यों रहे?
कैलाश विजयवर्गीय का ‘घंटा’ बयान सत्ता का सिग्नल?

भगीरथपुरा जल-कांड पर
वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय का बयान भी खासा चर्चा में रहा।
उन्होंने कहा था (भावार्थ में)
“घटना हुई है तो कार्रवाई होगी,
घंटा बजाकर नहीं बैठे रहेंगे।”
राजनीतिक हलकों में इस बयान को “सख़्त संदेश” और
“प्रशासन के लिए चेतावनी” दोनों तरह से पढ़ा गया।
सवाल यह है कि
क्या यह घंटा सिर्फ निचले अफसरों के लिए था
या नगर निगम आयुक्त की कुर्सी तक उसकी आवाज़ जानी चाहिए थी?
मुख्यमंत्री मोहन यादव की पोस्ट और आदेश
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने
इस मामले में सार्वजनिक रूप से पोस्ट कर x पर लिखा सख़्त कार्रवाई के संकेत दिए, जिसके बाद हटाने और स्थानांतरण की प्रक्रिया तेज़ हुई। लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा यह रही कि क्या यह कार्रवाई पहले नहीं हो सकती थी?
क्या 16 मौतों का इंतज़ार ज़रूरी था?

क्यों ज्यादा पेचीदा है यह मामला
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 3 बार लिखित चेतावनी दी
दो महीनों से शिकायतें लगातार आ रही थीं
इसके बावजूद सप्लाई फोर्स-क्लोज नहीं की गई
बीमारियाँ बढ़ती रहीं, प्रशासनिक फाइलें सोती रहीं
₹2.40 करोड़ का पाइपलाइन टेंडर महीनों दबा रहा
और जैसे ही मौतें हुईं
उसी दिन फाइलें “याद” आईं, टेंडर ओपन हुए
यह सब किसकी जिम्मेदारी थी?
नगर निगम आयुक्त की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति की
और वही कुर्सी आज सबसे ज़्यादा सवालों में है।
राजनीतिक फुटनोट: पुराना पैटर्न, नया मामला
दिलीप कुमार यादव का नाम पहले भी विवादों में रहा है
मंदसौर कलेक्टर रहते हुए डिप्टी सीएम से टकराव
तब भी ट्रांसफर को राजनीतिक एंगल से देखा गया
और अब भगीरथपुरा कांड में वही पैटर्न दोहराता दिख रहा है।
सूत्रों का दावा है कि
“दिलीप यादव मुख्यमंत्री मोहन यादव के करीबी अधिकारियों में गिने जाते हैं, इसीलिए कार्रवाई में देरी हुई।”
अब नैरेटिव यहीं आकर रुकता है
कटनी में कॉरपोरेट पर सख़्ती का दावा,
इंदौर में 16 मौतों के बाद भी जवाबदेही में हिचक, यही विरोधाभास दिलीप कुमार यादव की भूमिका को और गहराई से जांच के दायरे में लाता है।
कौन ज़िम्मेदार?
दूषित पानी की सप्लाई किसके आदेश पर जारी रही?
चेतावनियों को किस स्तर पर नज़रअंदाज़ किया गया?
टेंडर जानबूझकर क्यों दबाया गया?
और मौतों के बाद ही सिस्टम क्यों जागा?
डेमोक्रेसी बनाम ब्यूरोक्रेसी
यह मामला सिर्फ पानी का नहीं,
लोकतंत्र और नौकरशाही के चोली-दामन रिश्ते का भी है।
जब तक सिस्टम चलता रहता है तब तक अफसर सुरक्षित रहते हैं और जब सिस्टम फटता है
तो पहले छोटे मोहरे गिरते हैं,
मुख्य कुर्सी तक हाथ पहुँचते-पहुँचते
अक्सर लाशें गिननी पड़ती हैं।







