
फाइलों पर जमी धूल, सिस्टम की सुस्ती और फूट पड़ा गुस्सा
मंदसौर।
नगरपालिका में हाल ही में हुआ थप्पड़कांड सिर्फ एक व्यक्ति की आक्रामकता का मामला नहीं, बल्कि वर्षों से पनप रही फाइलों की लेटलतीफी और प्रशासनिक ढर्रे की देन है। इंजीनियर रोहित कैथवास के साथ पार्षद पति विक्रम भैरवे द्वारा की गई मारपीट ने उस सच को उजागर कर दिया, जिसे लंबे समय से दबाया जा रहा था ।
फाइलें दबाने का खेल।
आरोप है कि संबंधित इंजीनियर द्वारा फाइलों को जानबूझकर रोका गया, जिससे जनप्रतिनिधि और आम नागरिक दोनों ही परेशान थे। लेकिन सवाल यह है कि यदि सिस्टम चुस्त-दुरुस्त होता, तो क्या बात हाथापाई तक पहुंचती?
कलेक्टर पुष्प की पहल, जो अधूरी रह गई
यदि तत्कालीन कलेक्टर मनोज पुष्प की योजना समय पर लागू हो जाती, तो शायद यह बवाल ही न होता। उनके कार्यकाल में जिले के सरकारी महकमों में फाइलों की लेटलतीफी खत्म करने के लिए फाइल ट्रेकिंग सिस्टम शुरू करने की ठोस योजना बनी थी।
मंदसौर नगरपालिका को इस योजना का पायलट प्रोजेक्ट बनाया जाना था, लेकिन कलेक्टर के स्थानांतरण के साथ ही यह प्राथमिकता भी बदल गई।
प्रशासक काल में भी नहीं चली फाइल
बीते दो वर्षों तक नगरपालिका प्रशासक के तौर पर कलेक्टर के पास ही चार्ज रहा, लेकिन इस दौरान भी पूर्व कलेक्टर की इस सार्थक पहल पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।
योजना के तहत हर शाखा की फाइलों की बारकोडिंग, ऑनलाइन एंट्री और संबंधित बाबू से एफिडेविट लेने तक का प्रावधान था कि कोई फाइल छुपी नहीं है।
लेकिन फाइलों को अपने हिसाब से चलाने के आदी बाबू और अधिकारी इस व्यवस्था को कभी रास नहीं आने दी।
पारदर्शिता की कोशिश, जो सिस्टम ने नकार दी
मनोज पुष्प ने प्रशासक रहते हुए नगरपालिका में पारदर्शिता लाने का प्रयास किया था। खासतौर पर राजस्व, नामांतरण, निर्माण और उद्यान शाखा—जहां सबसे ज्यादा शिकायतें रहती हैं—वहां फाइल ट्रेकिंग से बड़ा फर्क पड़ सकता था।
पर योजना शुरू होने से पहले ही उसे हवा में उड़ा दिया गया।
कागजों में सिमट गया पूरा प्लान
ई-गवर्नेंस विभाग की निगरानी में हर फाइल को बारकोड देकर, टेबल-दर-टेबल ऑनलाइन ट्रेकिंग की व्यवस्था प्रस्तावित थी।
किस टेबल पर फाइल रुकी—यह कंप्यूटर खुद बताता। जवाबदेही तय होती।
लेकिन यह पूरा प्लान फाइलों में ही दफन हो गया।
इच्छाशक्ति की कमी या सुविधाजनक चुप्पी?
तत्कालीन कलेक्टर मनोज पुष्प और सीईओ ऋषभ गुप्ता दिल्ली मॉडल पर यह सिस्टम लागू करना चाहते थे। दोनों के स्थानांतरण के बाद आने वाले अधिकारियों ने इसे “असंभव” बताकर किनारे कर दिया।
नतीजा ना बारकोडिंग हुई, ना फाइल ट्रेकिंग।
थप्पड़ नहीं, सिस्टम को दोषी ठहराइए
नगरपालिका में हुआ बवाल चेतावनी है। जब सिस्टम जवाब देना बंद कर देता है, तो गुस्सा सड़कों और दफ्तरों में फूटता है।
थप्पड़ गलत है, लेकिन उससे पहले की प्रशासनिक चुप्पी भी कम दोषी नहीं।




