
S.I.R बना उम्मीद की डोर, मां की सूनी आंखों में फिर चमकी जिंदगी
मंदसौर।
एक मां के लिए बेटे का इंतज़ार कभी खत्म नहीं होता। साल दर साल बीत जाते हैं, चेहरे बदल जाते हैं, लेकिन उम्मीद वही रहती है—शायद आज… शायद कल। ढाकरिया मोहल्ला, खिलचीपुरा की एक मां ने 22 वर्षों तक यही इंतज़ार किया। और फिर एक दिन, किस्मत ने दस्तक दी।
यह कहानी है विनोद, जो 22 साल पहले घर से निकला और फिर लौटकर नहीं आया। मां की आंखों में सवाल रह गया, बेटा जिंदा है या नहीं? हर त्यौहार, हर सावन, हर दीपावली उसी सवाल के साथ गुज़री।
और फिर, उम्मीद वहां से आई जहां किसी ने सोचा भी नहीं था।
निर्वाचन आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (S.I.R) प्रक्रिया के तहत विनोद ने मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए अपने माता-पिता के दस्तावेज़ों की जानकारी मांगी। यही छोटी-सी सूचना उसकी मां तक पहुंची।
बस… यहीं से मां के दिल की धड़कनें तेज हो गईं।
बरसों बाद पहली बार लगा—
“मेरा बेटा जिंदा है।”
मां ने थाने में आवेदन दिया। जानकारी जुटाई गई। धीरे-धीरे पता चला कि विनोद न सिर्फ जिंदा है, बल्कि अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ एक नई जिंदगी जी रहा है।
जब मां-बेटे को आमने-सामने लाया गया, तो वहां शब्द नहीं थे
सिर्फ आंसू थे।
22 साल का दर्द, गुस्सा, शिकायत… सब एक गले मिलने में पिघल गया।
मां की कांपती उंगलियां बेटे के चेहरे को छू रही थीं, मानो यकीन कर रही हों कि यह सपना नहीं है। पोते-पोती पहली बार दादी की गोद में आए, एक ऐसा रिश्ता, जो समय ने छीन लिया था, आज लौट आया।
यह सिर्फ एक व्यक्ति की घर वापसी नहीं थी। यह मां की टूटती सांसों में नई जान
और एक परिवार की अधूरी कहानी का पूरा होना था।
S.I.R जैसी प्रक्रिया ने यह साबित कर दिया कि कभी-कभी सरकारी कागज़ात भी इंसानियत की सबसे खूबसूरत कहानी लिख देते हैं।







