करोड़ों के शुद्धिकरण का पोस्टमार्टम, श्रद्धालुओं को खुले में विवशता, घाट पर गंदगी हावी,
अष्टमुखी पशुपतिनाथ के चरणों में बहती पावन नदी को न श्रद्धा का सहारा मिल रहा, न सिस्टम की सुध, घाटों की आत्मा घुट रही है

मंदसौर।
सावन में पावन शिवना नदी की कल-कल बहती धारा अब भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है, लेकिन घाटों की गंदगी, अव्यवस्था और उपेक्षा देखकर लगता है मानो यह किसी ईश्वर की भूमि नहीं, सिस्टम की नाकामी की तस्वीर हो। करोड़ों रुपए के शुद्धिकरण प्रोजेक्ट, जो कभी शिवना को गंगा बनाने के सपने की शुरुआत थे, आज भ्रष्टाचार, प्रयोगवाद और खानापूर्ति की भेंट चढ़ चुके हैं।
घाटों पर नहीं कोई मूलभूत सुविधा, श्रद्धालु खुले में विवश
श्रद्धालु देश के कोने-कोने से पशुपतिनाथ महादेव के दर्शन के लिए मंदसौर आते हैं। वे स्नान करते हैं, पूजा करते हैं, धार्मिक कर्म करते हैं, लेकिन घाट क्षेत्र में शौचालय या पेशाबघर जैसी बुनियादी सुविधा तक नहीं। हालांकि मंदिर क्षेत्र में व्यवस्थाएं ठीक हे, आगे सुलभ शौचालय भी, लेकिन सीधे घाट पर कोई व्यवस्था नहीं, जिससे बाहर से आने वाले लोग खुले में शौच या कोनों में लघुशंका करते हुए दिखाई देते हैं। इससे घाट की गरिमा और स्वच्छता दोनों पर आघात होता है।
जहां कभी अस्थियां प्रवाहित होती थीं, अब वहीं पिंडदान और कर्मकांड
शिवना घाट पर पहले अस्थियों का प्रवाह और अंतिम दर्शन की शांति होती थी, अब घाटों पर खुले में हवन, पूजन और पिंडदान जैसे कर्मकांड होते हैं, लेकिन कोई सुनिश्चित स्थान या व्यवस्था नहीं। पूजा सामग्री, कपड़े, जूते, प्लास्टिक और राख, सब एक साथ घाट की सीढ़ियों पर बिखरे पड़े रहते हैं। न व्यवस्था, न नियंत्रण, आस्था अब अव्यवस्था की चादर ओढ़े खड़ी है।
शुद्धिकरण के नाम पर बहा दिया पैसा, सिस्टम मौन
शिवना शुद्धिकरण के नाम पर पिछले कुछ वर्षों में करोड़ों खर्च किए गए, लेकिन न कोई स्थायी आउटलेट बंद हुआ, न नालों का उपचार हुआ। न ट्रीटमेंट प्लांट चालू दिखता है, न कोई ठोस कार्रवाई। तमाम योजनाएं, कागज़ी घोषणाएं और सरकारी ठेकेदारों की जेबें भरने वाले काम अब सिर्फ पोस्टर बनकर दीवारों पर बचे हैं। नदी आज भी वही गंदा पानी पी रही है, जो शहर के पेट से बहकर आता है।
भक्ति में भाव नहीं, प्रचार है, सेवा का कोई भाव नहीं,
हर गली, हर मंच पर पशुपतिनाथ के भक्त होने का दावा करने वालों की भीड़ है, लेकिन जब बात सेवा और समस्याओं के समाधान की होती है, तो सभी मौन। घाटों की दुर्दशा पर कोई जनप्रतिनिधि नहीं बोलता, न ही कोई सामाजिक संगठन उठाता है आवाज। फोटो, पोस्टर और भाषणों से सेवा नहीं होती, ज़मीन पर उतरना पड़ता है।
जनभागीदारी का सपना — जनता के ही सिर फोड़ दिया गया
शिवना को बचाने के लिए जो आंदोलन कभी विधायक विपिन जैन मेहनत और जनता के श्रम से शुरू हुआ है, आज उसी जनता को गंदगी, अव्यवस्था और प्रशासनिक ठिठोली का शिकार होना पड़ रहा है। यह सब देख लगता है मानो शिवना के नाम पर चल रहा जन-जागरूकता अभियान नहीं, पोस्टमार्टम हुआ है इस नदी की आत्मा का।
सोचने वाली बात है
करोड़ों खर्च हुए, लेकिन घाट की एक सीढ़ी भी साफ नहीं, ये शुद्धिकरण था या भ्रष्टाचार का शृंगार?
श्रद्धालुओं को सुविधा देना प्रशासन की ज़िम्मेदारी है या दानदाताओं की दया पर छोड़ा गया?
क्या नगर प्रशासन, मंदिर समिति और यातायात प्रबंधन — सबने आंखें मूंद ली हैं?
यह सिर्फ नदी नहीं
शिवना सिर्फ एक नदी नहीं, मंदसौर की सांस्कृतिक आत्मा है। और आज ये आत्मा सिसक रही है — गंदगी, उपेक्षा और अनदेखी के बीच। अगर अभी भी प्रशासन और समाज नहीं जागा, तो एक दिन यह घाट भी इतिहास बन जाएगा, श्रद्धा का नहीं, शर्म का ।
विधायक विपिन जैन ओर जनता ने जतला दिया है कि संकल्प में शक्ति है, समय आ गया है राजनीतिज्ञ से उठकर शिवना मैया के उद्धार के लिए सब एक मत होकर काम करें ।
अब घाट सेवा चाहिए, दिखावा नहीं, शिवना को शुद्ध करना है तो पहले मन और मंशा को साफ करना होगा।