नीमच जैसे शहर में शतरंज के आयोजन को केवल एक प्रतियोगिता मान लेना इसकी आत्मा को कम करके आंकना होगा।

शतरंज दरअसल जीवन का प्रतिबिंब है, जहां हर चाल सोच-समझकर चलनी होती है, जहां जल्दबाज़ी हार में बदल सकती है और धैर्य, अनुशासन व दूरदृष्टि ही जीत की कुंजी बनते हैं।
नई पीढ़ी के लिए यह मंच इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उन्हें सिखाता है कि जीवन में हर मोड़ पर केवल ताकत नहीं, रणनीति चाहिए। शतरंज बताता है कि कभी-कभी एक साधारण सा प्यादा भी सही समय पर पूरे खेल की दिशा बदल सकता है, बशर्ते उसे सही मार्गदर्शन मिले।
जीवन और शतरंज : नियम वही, मैदान अलग
शतरंज का हर नियम जीवन के किसी न किसी सच से जुड़ा है,
हर चाल का परिणाम होता है, ठीक वैसे ही जैसे जीवन के हर निर्णय का।
गलती की गुंजाइश कम होती है, इसलिए सोच जरूरी है।
धैर्य रखने वाला खिलाड़ी अंत में बढ़त बनाता है।
और सबसे अहम, राजा की रक्षा, यानी मूल्यों और चरित्र की सुरक्षा।
अशोक जी : सोच की बिसात बिछाने वाले
अशोक जी गंगानगर केवल इस आयोजन से जुड़े नाम नहीं हैं, बल्कि शतरंज के गहरे समझदार भी हैं। यह उनका पसंदीदा खेल है और वे इसे केवल खेल नहीं, मानसिक संस्कार मानते हैं।
वे खेल को समाज और जीवन से जोड़कर देखते हैं। इस आयोजन में भी उनकी भूमिका प्रेरक रही, जहां खुद शतरंज की बिसात जमाने वाले अशोक जी, नई पीढ़ी के लिए सोच की बिसात तैयार करते नजर आए। यह आयोजन सिर्फ मुकाबलों का नहीं, बल्कि सोच को धार देने का प्रयास था।
टीमवर्क : पर्दे के पीछे की असली जीत
किसी भी सफल आयोजन की तरह, यहां भी एक समर्पित टीम काम कर रही थी। व्यवस्थाओं से लेकर खिलाड़ियों की सुविधा तक, हर स्तर पर यह साफ दिखा कि यह आयोजन सिर्फ औपचारिकता नहीं, प्रतिबद्धता से किया गया। अशोक जी की टीम ने यह साबित किया कि जब सोच साफ हो, तो व्यवस्था अपने-आप मजबूत हो जाती है।
अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी और प्रशिक्षक : नीमच के लिए बड़ी बात इस आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी और प्रशिक्षक इसमें शामिल हुए।
उनकी मौजूदगी ने न केवल प्रतियोगिता का स्तर ऊंचा किया, बल्कि स्थानीय खिलाड़ियों और बच्चों को यह भरोसा भी दिया कि प्रतिभा अगर सच्ची हो, तो मंच खुद रास्ता बनाता है।
नीमच जैसे शहर के लिए यह एक संदेश था, हम पीछे नहीं हैं, बस अवसर की जरूरत है।
नन्हे खिलाड़ी, बड़ी संभावनाएं
इस आयोजन की सबसे खूबसूरत तस्वीर वे छोटे बच्चे रहे, जिनकी आंखों में जीत से ज्यादा सीखने की चमक थी।
किसी की चाल में झिझक थी, तो किसी में आत्मविश्वास, लेकिन हर चेहरे पर भविष्य की कहानी लिखी जा रही थी। शतरंज ने इन बच्चों को सिखाया कि हार अंत नहीं, सीख की शुरुआत होती है।
नीमच में हुआ यह शतरंज आयोजन एक संकेत है कि छोटे शहर अब बड़े सपने देखने लगे हैं। जब अशोक जी गंगानगर जैसे लोग आगे आते हैं, जब बच्चे बिसात पर बैठते हैं और जब अंतरराष्ट्रीय अनुभव स्थानीय जमीन से जुड़ता है तो समझिए यह सिर्फ खेल नहीं, भविष्य का निर्माण है।




