संघर्ष की राह पर चला हर कदम, सफलता की इबारत बन गया।

सीमित साधनों, सादगीभरे परिवेश और छोटे से नगर की गलियों से निकलकर जब कोई व्यक्ति दुबई जैसे वैश्विक मंच पर अपनी अलग पहचान बनाता है — और फिर अपने समाज, अपनी मिट्टी को लौटाने के संकल्प के साथ वापसी करता है — तो वह महज उद्योगपति नहीं रहता, वह सबके लिय प्रेरणा बन जाता है।

नरेश भावनानी , मंदसौर की उसी साधना भूमि का एक तेजस्वी नाम है, जिसने कारोबारी दुनिया में न केवल मुकाम पाया, बल्कि उसे भारतीयता की गरिमा से सजाया। हाल ही में जब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव दुबई प्रवास पर थे, तो उनकी भावनानी से भेंट ने एक नई संभावनाओं का द्वार खोला — मंदसौर के लिए, प्रदेश के लिए, और उद्योग जगत के लिए।


गांव की गली से ग्लोबल स्टेज तक: एक प्रेरक यात्रा

नरेश भावनानी की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं। मंदसौर जैसे कृषि-प्रधान जिले की सीमाओं को पार कर उन्होंने दुबई में अपनी मेहनत, सादगी और सिद्धांतों से वो जगह बनाई, जिसे पाना लाखों लोगों का सपना होता है। लेकिन इस सफलता का सबसे खूबसूरत पहलू यह है कि उन्होंने अपनी फक्कड़ मिजाजी की जड़ों को कभी नहीं छोड़ा।

“मुझे वही चाहिए जो मेरा हक है — न ज़्यादा, न कम,”
— यह कथन उनके चरित्र की ईमानदारी, स्पष्टता और आत्मसम्मान की गवाही देता है।


मुख्यमंत्री से संवाद: भरोसे की नींव पर नया मध्यप्रदेश

दुबई में आयोजित प्रवासी भारतीय सम्मेलन में जब मुख्यमंत्री मोहन यादव की नरेश भावनानी से मुलाक़ात हुई, तो मंच केवल राजनैतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी बन गया।

“बिना आंख मिलाए ज़मीन की स्वीकृति मिल गई — यही है नया मध्यप्रदेश।”
— मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव

यह कथन केवल एक प्रशंसा नहीं, बल्कि उस सुधरते सरकारी सोच का संकेत है, जिसमें योग्य और प्रतिबद्ध निवेशकों को सिर्फ़ दस्तावेज़ नहीं, सम्मान भी मिलता है।


मंदसौर को मिला गौरव, मिली नई दिशा

यह सिर्फ़ एक मुलाक़ात नहीं, बल्कि मंदसौर के लिए उद्योग, रोजगार और संभावनाओं के नए अध्याय की शुरुआत हो सकती है:

स्थानीय युवक ने अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई।
विदेश में रहते हुए भी अपनी मातृभूमि को न भूला।
मुख्यमंत्री के समक्ष खुलकर संवाद किया, सौम्यता के साथ हक मांगा।
नवोदित उद्यमियों के लिए एक आदर्श बनकर उभरे।
प्रदेश में निवेश व विकास की सोच को नया आयाम दिया।


दुबई में दिल, मंदसौर में धड़कन

नरेश भावनानी जैसे प्रवासी भारतीय केवल उद्योगपति नहीं — संस्कृति, सेवा और संकल्प के वाहक होते हैं। वे वहां पूंजी कमाते हैं, लेकिन यहाँ संवेदना बोते हैं।
उनके द्वारा स्थापित संस्थाएं चुपचाप, संयमित और सटीक तरीके से गरीबों, जरूरतमंदों और असहायों की मदद करती हैं, बिना शोर-शराबे, बिना प्रचार।

उनकी सोच स्पष्ट है, “मदद ऐसी हो जो जरूरतमंद तक पहुँचे, और दुनिया को कहने की ज़रूरत ही न पड़े।”


अब बारी मंदसौर की है

नरेश भावनानी की यात्रा हर उस युवा को यह संदेश देती है कि सपनों का शहर जन्म स्थान नहीं होता — वह विचार, साहस और निरंतरता का परिणाम होता है।
उन्होंने न केवल आर्थिक ऊंचाई पाई, बल्कि सामाजिक चेतना और उदात्त सेवा का उदाहरण भी प्रस्तुत किया।

अब समय है कि मंदसौर उनके अनुभव, ऊर्जा और आत्मीयता से लाभ ले। नए उद्योग, नई नौकरियां, और नई संभावनाएं केवल सरकार नहीं, समाज को भी तैयार करनी हैं।

सीमाएं टूटें, सपने जिएं

नरेश भवंानी कि अपनी लाइफ स्टाइल है, प्रचार ओर दिखावा उनके पल्ले कम ही पड़ती हैं, वे उन विरले लोगों में से हैं जो
“कम बोलते हैं, लेकिन बड़ा बोलते हैं — और उससे भी बड़ा करके दिखाते हैं।”

उनकी यह कहानी मंदसौर की माटी को विश्वास दिलाती है कि
जो अपनी मिट्टी से प्रेम करता है, वो कहीं भी जाकर भी उसे संवार सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You cannot copy content of this page