
(इंदौर की हृदयविदारक घटना में असमय काल के गाल में समाए सभी युवाओं को विनम्र श्रद्धांजलि एवं शोकाकुल परिवारों के प्रति गहरी संवेदना)
इंदौर की वह सुबह केवल एक सड़क दुर्घटना की खबर नहीं लाई, वह हमारे समय, हमारी परवरिश और हमारी तथाकथित आधुनिक जीवनशैली पर एक करारा तमाचा थी। सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलियों की बाढ़ आ गई, संवेदनाओं के शब्द बहने लगे, लेकिन बहुत कम लोगों ने उस कड़वे सच पर उंगली रखी, जिसने तीन जिंदगियाँ छीन लीं और चौथी को मौत से जूझने पर मजबूर कर दिया।
पुलिस के अनुसार, दो युवक और दो युवतियाँ रातभर जन्मदिन का जश्न मनाते रहे। शराब की बोतलें, डिस्पोजेबल गिलास और तेज रफ्तार कार, यह सब किसी कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि घटनास्थल से मिले वे संकेत हैं, जो बताते हैं कि नशा सिर्फ साथ नहीं था, वही स्टेयरिंग पर बैठा था। सुबह करीब पाँच बजे तेज रफ्तार कार एक खड़े ट्रक से टकराई और जश्न मातम में बदल गया। तीन युवाओं की मौके पर ही मौत हो गई, चौथी की हालत नाजुक बनी हुई है।
यह हादसा नहीं, चेतावनी है।
सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि कार कितनी तेज थी, बल्कि यह है कि रातभर घर से बाहर रहे ये बच्चे किसकी निगरानी में थे?
क्या परिवारों को पता नहीं था कि उनके बच्चे कहाँ हैं, किस संगत में हैं, किस हालात में हैं?
यह घटना किसी एक वर्ग, जाति या परिवार तक सीमित नहीं है। यह सच्चाई बताती है कि दौलत, पद, प्रतिष्ठा और राजनीतिक पहचान बच्चों की सुरक्षा की गारंटी नहीं बन सकती। खतरा हर घर की देहरी पर खड़ा है।
आज एक प्रबुद्ध समाजजन की कही बात बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है,
“आज वही परिवार भाग्यशाली हैं, जिनके बच्चे नशे, जुए, सट्टे और तथाकथित मॉडर्न लाइफस्टाइल की अंधी दौड़ से बचे हुए हैं और यह बचाव संयोग से नहीं, परिवार की सजग भूमिका से होता है।”
यही इस संपादकीय का मूल संदेश है, परिवार की अवेयरनेस।
आज के माता-पिता बच्चों को मोबाइल, कार, पॉकेट मनी और आज़ादी तो दे रहे हैं, लेकिन समय, संवाद और सीमाएँ नहीं दे पा रहे। आधुनिकता का अर्थ खुले विचार और आत्मनिर्भरता है, न कि बेलगाम आज़ादी। पार्टी के नाम पर नशा, मस्ती के नाम पर मौत, यह आधुनिकता नहीं, आत्मघाती लापरवाही है।
युवाओं से भी एक सीधा सवाल है कि
क्या एक रात का नशा, एक पल का रोमांच, पूरी ज़िंदगी से बड़ा हो सकता है?
क्या माँ-बाप के सपने, परिवार की प्रतिष्ठा और समाज की उम्मीदें इतनी सस्ती हैं?
हमें यह स्वीकार करना होगा कि बच्चे सिर्फ परिवार की नहीं, देश और समाज की धरोहर हैं।
एक-एक युवा के साथ भविष्य जुड़ा है। जब एक बच्चा मरता है, तो केवल एक घर का चिराग नहीं बुझता बल्कि समाज कुछ खो देता है, देश अपना एक मजबूत कंधा गंवा देता है।
अब भी समय है।
माता-पिता बच्चों के मित्र बनें, लेकिन आँख बंद कर भरोसा न करें।
आधुनिकता के नाम पर उजड़ता भविष्य और हमारी चुप्पी
समाज केवल शोक संदेश न लिखे, बल्कि संवाद, निगरानी और संस्कार का वातावरण बनाए।
क्योंकि अगर आज हमने नहीं संभाला,
तो कल फिर किसी और शहर,
किसी और परिवार,
किसी और अखबार में
इसी तरह की खबर हमारा इंतज़ार कर रही होगी।
ज़िंदगी मौत न बन जाए…
संभालो यारो।







