कश्मीर “फाइल” की फाइल निपटाता सिनेप्लेक्स .. टैक्स फ्री का भी हो रहा पोस्टमार्टम

जब सिनेमा की बात होती है तो अच्छा मेसेज देने वाली बॉलीवुड की कई महान पिक्चर्स तो याद आती है… लेकिन बदलते दौर ने ऐसी पिक्चर बनाना कम कर दिया है..सो अब जब कोई अच्छी फिल्म रिलीज होती है तो दर्शकों को याद आता है सिनेमा घर की.. सीट, स्क्रीन और थियेटर मालिक की एक प्रकार की ठगी ने आम आदमी की जेब साफ करती नजर आती है… टिकटों के भाव हर रोज और कभी कभी हर शो में बदलते हैं..कभी 200 रु. कभी 250 तो कभी 450 से 500 तक भी पहुंच जाते है।
सोने , डीजल पेट्रोल के भाव हर रोज शासन प्रशासन द्वारा बदले जाते है इसकी वजह होती है कि एसे उत्पादों का मूल्य कई कारणों की वजह से बदलते हैं.. जैसे खपत , राजनेतिक वजह भी होती है फिर इसका मूल्य निर्धारित होने पर सरकार की मोहर भी होती हो..लेकिन एसे में आम जन के लिए विपक्ष भी चिल्लाता है..जबकि इनका भाव सरकार द्वारा निर्धारित किया जाता है..इधर सिनेमा हॉल की टिकट का मूल्य सिनेमा घरों(माल्टिप्लेस) के मालिक सरकार से दो कदम आगे बढ़कर अपने हिसाब से तय करते है ।
जब भी कोई असरकारक फिल्म किसी सामाजिक मुद्दे पर या संदेश देने या फिर जागृति फैलाने के लिए बनती है तब सरकार की मंशा रहती हैं कि ज्यादा से ज्यादा से ज्यादा आवाम उसे देखे… वह इसलिए कि सिनेमा गंभीर मुद्दो को आसान भाषा मे समझने का जरिया है..
कश्मीर फाइल्स को मध्य प्रदेश मे कर मुक्त कर दिया गया है..राज्य और केंद्र सरकार संदेश भी दे रही है कि आवाम ये फिल्म देखे..पर सरकार के मंसूबों पर थियेटर मालिक अपनी लालच का पोता लगा रहे है..लेकिन अपनी मोनोपली का फायदा उठाकर स्काय सिनी प्लेक्स पर टैक्स फ्री होने के बावजूद टिकट दर लगभग वहीं है जो आप फिल्मों का रहता है… एक तरफ सरकार इस फिल्म का टैक्स माफ कर रही है..वहीं स्काय सिनेप्लेक्स जबरिया सर्विस चार्ज( जिसके लिए दर्शक माना भी कर सकता है) दर्शकों से वसूला कर रहा है, सवाल यह उठता है कि जब टिकट के दाम पर्याप्त से भी ज्यादा है तो सर्विस चार्ज किस बात का ? फिल्म देखकर सपनों या हकीकत की दुनियां से रूबरू होने वाले दर्शक कोई सुनने वाला ही नहीं है , एक मुद्दा ये भी है मंदसौर मे स्काई सिनेप्लेक्स के अलावा और कोई सब्स्टीट्यूट भी नही है, जिससे इस मल्टीप्लेक्स की इस शहर मे मोनोपॉली भी हो चुकी हैं । रोज ठगाने वाला दर्शक
जब इस सिनेमा घर में प्रवेश करता है तो टिकट के पैसे के अलावा सिनेमा हॉल में खाने पीने की चीजे में की कीमत दर्शकों के जेब काटने वाली होती हैं… 10 रू का पॉपकॉर्न 100 रू.में जबकि इसकी क्वालिटी भी कुछ खास नहीं रहती, बाकी की सामग्री दर में भी जेबकटी की बू आती हे..
हमारे देश मे मध्यम वर्ग के लोग जायदा है एसे सिनेमा घरों के टिकटों के दाम इतने है कि है, अब मध्यम और गरीब वर्ग का सिनेमा देखना सपना बनता जा रहा है और ऐसी जेबकटी या गिरहकटी पर अंकुश लगाने वाले संबंधित अधिकारी गाफिल होकर औंधे मुंह पड़े है।