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लोकतंत्र के उत्सव में स्वप्रेरण से प्रत्येक व्यक्ति को वोट डालना चाहिए

मन्दसौर। जिस व्यक्ति को अनुशासनकर्ता अप्रिय लगता है, उनके आदेश को गुलामी का प्रतीक मानता है, कांटे की भांति अखरता है ऐसी आत्मा परमात्मा के पास जाकर भी अपना उत्थान करने में सक्षम नहीं हो सकती है।
उक्त विचार राष्ट्रसंत कमल मुनि कमलेश ने जीवागंज जैन दिवाकर भवन मंदसौर में धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहे। आपने कहा कि अनुशासन ही धर्म का असली प्राण है साधना का राजमार्ग है और आत्मा के उत्थान में सहयोगी है। शासन के भाव में की गई आराधना साधना भी मुक्ति के बजाय कर्म बंधन का कारण ही बनती है।
मुनि कमलेश ने कहा कि विश्व के सभी धर्मों ने अनुशासन को सर्वोपरी स्थान दिया है यही जीवन का सच्चा श्रृंगार है, अनमोल धरोहर है, अनुशासन के अभाव में अमृत जैसे काम भी जहर के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। राष्ट्रसंत ने बताया कि अत्यंत दुख तब होता है जब धर्म की बड़ी-बड़ी बातें कहने वालों के जीवन में अनुशासन के दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं। अनुशासनहीनता राक्षसी प्रवृत्ति के लक्षण है। उन्होंने कहा कि अनुशासन कर्ता को जो परमात्मा के रूप में मानेगा उसी को परमात्मा की प्राप्ति होगी। जैन संत कहा कि आत्म अनुशासन जिसने सीख लिया उसका जीवन कदम-कदम पर स्वर्गमय बन जाएगा।

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