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मौन में मुखर हुई ‘मीनाक्षी

वर्तमान राजनीति सेवा, मानवता और निस्वार्थ भावना को कोसो पीछे छोड़, स्वार्थ से बनी सोने की पटरियों पर बुलेट स्पीड से दौड़ रही है, जहां कालाधन, कालामन और सत्ता पर येन केन प्रकारेण कब्जा जमाने का भाव ही उसके ईधन को काम कर रहे है, लक्झरी लाइफ, लम्बी गाडिय़ां मंहगे कपड़े अब किसी भी पोलिटिशियन के लिए सामान्य हो चले है। लेकिन दीदी मीनाक्षी शायद किसी और मिट्टी से बनी है शायद उस मिट्टी से जिसे कांग्रेस खुद भी बापू की अस्थियों के साथ हवा में उड़ाकर भुला चुके है लेकिन मीनाक्षी नटराजन उस लुप्त कांग्रेसी प्रजाति के मजबूत अवशेष के रूप में कांग्रेस ही नहीं समूची राजनीति को शुचिता का पाठ पढ़ा रही है। उनके सादे कपड़े सादा जीवन और सप्ताह में एक दिन मौन रहने को लेकर अनेक बार उंगलियां उठाने वाले मिल जाते है वो सिर्फ विपक्ष में ही नहीं उनके अपने दल में भी मौजूद है, दीदी ने लोकसभा मतदान के पूर्व अपने मौन को लेकर कलम से आवाज उठाई है जिसमें ‘मौनÓ को लेकर भी उनकी गंभीर समझ परिलक्षित होती है, वे स्वयं मानती है कि चुप रहना मौन नहीं है यह अबोला मात्र है, और वे मौन दिवस पर घंटे आधे घंटे मौन में उतरने का प्रयास करती है दीदी ने इस पत्र में अपने मन में उठे अन्तद्र्वन्द को भी उठाया है और कहा कि मैंने ऐसे महत्वपूर्ण समय में भी यह निर्णय लिया कि मैं मौन रहूंगी, अगर मैं अभी मौन तौड़ती तो यह विशुद्ध स्वार्थ होता। पत्र में दीदी ने ईश्वर से प्रार्थना की है कि उनके मन पर नियंत्रण को और मजबूत करें। बहरहाल आज की पोलिटिक्स में ये बातें किसी ‘एलियनÓ की कथा सी लगती है लेकिन ऐसे एलियन्स का राजनीति में होना मात्र बड़ी बात है ये चीजें हारजीत से बहुत ऊपर की है।
पब्लिक को लिखी मिनाक्षी की पाती देखे पेज दो पर।

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