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आधे साल की रियासत और अध्यक्ष विहीन नपा मंदसौर

आधे साल की रियासत और अध्यक्ष विहीन नपा मंदसौर

आधे साल की रियासत और अध्यक्ष विहीन नपा मंदसौर

43 साल बाद आया मौका तो देरानी-जेठानी जैसे विवादों में उलझी कांग्रेस

पालो रिपोर्टर = मंदसौर
सुबह में कांग्रेसी और कांग्रेस सरकार अपने 6 माह पूर्ण होने का जश्न मना रही हैं और अपनी 6 महिनों की तथाकथित उपलब्धियां सोशल मीडिया से लेकर चौक-चौराहों तक उफान पर ला रहे हैं, लेकिन हकीकत की बात करें तो यह वो सरकार है जो 6 माह बितने पर भी मंदसौर जैसी नगर पालिका जो बिना किसी चुनाव के आसानी से करीब 43 साल बाद हाथ आ रही थी उस मौके को भी गवां बैठी। स्थानीय नेताओं के देवरानी-जेठानी जैसे झगड़ों ने किसी एक चेहरे पर रजामंदी होने नहीं दी और कांग्रेस का आला संगठन व सरकार भी इन छोटे नेताओं के आकाओं की गुटबाजी के आगे पंगू होकर सब कुछ मुक बधिरों की तरह देखता रहा। खैर ये वही कांग्रेस है जो सालों हो गए एक जिलाध्यक्ष नहीं बदल पाई।
प्रदेशभर के आला नेता जब कभी मंदसौर आते हैं या यहां की कांग्रेसी सियासत में अच्छी खासी दखल रखने वाली पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन से जब भी कांग्रेसी गुटबाजी के संबंध में कोई बात की जाए तो वे अक्सर यही कहते दिखाई व सुनाई देती हैं, कि कांग्रेस में सभी एक हैं, कहीं कोई गुटबाजी नहीं, लेकिन इस गुटबाजी का एक सबसे बड़ा उदाहरण 17 जनवरी से लेकर अब तक मंदसौर की जनता देख रही है, कि ये कांग्रेस एक नपाध्यक्ष तक नहीं चुन पाई। दरअसल सामने-साम सभी पार्षद नपाध्यक्ष की कुर्सी पर किसी को भी बैठाने के लिए राजी हुए, लेकिन जब-जब इस मामले में प्रदेश सरकार ने किसी एक पर राय बनानी चाही तो सभी पार्षदों ने अपने-अपने स्तर पर इतनी जबरदस्त चुगलखौरी की जुगलबंदी आला कमान तक पहुंचाई कि सरकार खुद काफी असमंजस की स्थिति में पहुंच गई। बात यहीं तक सिमित नहीं रही कुछ कांग्रेसी पार्षदों ने तो अपने-अपने गॉड फादरों तक को फोन लगाकर अपनी दावेदारी जमकर पेश की, जिसके चलते ये तमाम गॉड फादर सरकार के सामने अपने-अपने छर्रों को मंदसौर नपाध्यक्ष की सीट पर बैठाने के लिए भोपाल में राग अलापते रहे और हालात यह हो गए कि आखिकार प्रशासक (सरकारी बंदा) नियुक्त करना पड़ा।
खास बात – प्रदेश सरकार भी गुटबाजी के चलते तय नहीं कर पाई अध्यक्ष का चेहरा
विपक्ष में रहते हुए कोई प्रदर्शन नहीं और…
एक प्रमुख बात यह है, कि जब प्रहलाद दादा जीवीत थे और उनके पूरे कार्यकाल में विपक्ष में बैठे कांग्रेसी पार्षद कभी किसी जनहित के मुद्दे पर कोई बड़ा धरना, प्रदर्शन, विरोध अथवा इस तरह का कोई आंदोलन उल्लेखनीय रूप से नहीं कर सके और जब करीब 43 साल बाद नपा की सजी-सजाई थाली मौके और दस्तूर के रूप में कांग्रेस के सामने जीमने के लिए आई तो पूरे कार्यकाल में चुप बैठे पार्षद भी अलग-अलग तरह के राग आलापने लगे। सूत्र तो यह तक बता रहे हैं, कि कुछ पार्षदों ने तो किसी फलाना पार्षद को नपाध्यक्ष बनाए जाने पर अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने पर बैठने की धमकी तक दे डाली थी।
महज दो नपाध्यक्ष चुन सके कांग्रेसी पार्षद
बात यदि मंदसौर नपा और कांग्रेस के तालमेल की इतिहास के झरोखे से करें तो जब से मंदसौर नपा बनी है तब से अब तक यहां ढाई-ढाई साल के लिए दो नपाध्यक्ष कांग्रेस बैठे हैं। साल 70 के दशक में करीब 1976 में आई परिषद के दौरान पहले ढाई साल के लिए नपाध्यक्ष के लिए डॉ ज्योति शुक्ला को चुना गया तथा दूसरे ढाई साल के लिए मम्मू खां इस पद पर रहे। खास बात यह है, कि ये दो नपाध्यक्ष भी उस वक्त चुने गए जब प्रत्यक्ष रूप से जनता नहीं बल्कि पार्षद मिलकर नपाध्यक्ष को चुनते थे। इस मान से देखा जाए तो जनता ने बतौर नपाध्यक्ष सीधे तौर पर कांग्रेस पर कभी भरोसा जताया ही नहीं।
दस साल में एक जिलाध्यक्ष भी नहीं बदल सके
बात यदि मंदसौर नपाध्यक्ष या नपा में कांग्रेस का नेता प्रतिपक्ष चुनने तक हो तो भी ठीक है, लेकिन एक आश्चर्य और मंदसौर जिले की जनता विगत दस साल से कांग्रेस के जिलाध्यक्ष के रूप में प्रकाश रातडिय़ा को देख रही है। दरअसल आश्चर्य इस बात का है, कि इनके कार्यकाल में अब तक साल 2009 का लोस चुनाव तथा सुवासरा विस चुनावों को छोड़ दें तो कांग्रेस लगभग हर स्तर का चुनाव जिले में हारती ही आई है बावजूद इसके न तो कभी कांग्रेस आला कमान ने यहां जिलाध्यक्ष बदला और न कभी स्थानीय कांग्रेस के आला नेताओं ने इस ओर कोई ध्यान दिया हैरत है कि यहां कार्यकारी जिला अध्यक्ष की बाढ़ है जबकि कांग्रेस में बतौर जिलाध्यक्ष एक से एक अनुभवी चेहरे मोहरे चौक-चौराहों पर दिखाई दे सकते हैं।
नपाध्यक्ष तो छोड़ों नेता प्रतिपक्ष तय नहीं हुआ कांग्रेस से
खैर नपाध्यक्ष तय करने का रांडी रोना तो दादा के देहांत के बाद शुरू हुआ, जिसे महज पांच महिने ही हुए हैं, लेकिन इससे बड़ी और देश के एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दल के लिए शर्मनाक बात यह है, कि वो नगर पालिका में अपना एक नेता प्रतिपक्ष नहीं तय कर पाया। जी हां संभवत: नपा के इतिहास का यह पहला कार्यकाल होगा जो बिना नेता प्रतिपक्ष के बित जाएगा और आखरी के इस साल में खुद विपक्ष में बैठने लायक लोग एक कुसंयोगवश पक्ष में आने के बादवजूद नपाध्यक्ष की कुर्सी नहीं भोग सके।

patallok

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