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आत्महत्याओं की पड़ताल पर सांसे तोड़ती परिजनों की उम्मीद

आत्महत्याओं की पड़ताल पर सांसे तोड़ती परिजनों की उम्मीद

आत्महत्याओं की पड़ताल पर सांसे तोड़ती परिजनों की उम्मीद

पैंडिंग अपराधों में अधिकांश सुसाइड के मामलों पर किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई पुलिस की तफ्तीश

थानों की आलमारियों में धुल चाट रही आत्महत्या की फाइलें
पालो रिपोर्टर = मंदसौर

जि़ंदगी की पहेली को बुझाते-बुझाते कई बार जि़ंदगी खुद एक एसे मोड़ पर आकर खड़ी हो जाती है, कि उसे सिर्फ और सिर्फ आत्महत्या के सिवाय कुछ नहीं सुझता। हालांकि जिंदगी की संघर्ष का दूसरा नाम है कभी इससे थक या हारकर मौत का रास्ता नहीं अपनाना चाहिए। खैर, लेकिन इल्म इस बात का है, जो लोग जिन लोगों या कारणों से इस खुबसुरत दुनिया से विदा ले लेते हैं उनके इस कदम की जांच का जिम्मा जिस पुलिस महकमे पर है वो भी कभी सुसाइड के मामलों में ज्यादा गंभीरता दिखाता नहीं दिखता और मरने वालों के परिजनों की उम्मीदों की सांसे खाकी इसी कभी पूरी न होने वाली पड़ताल पर आते-आते एक दिन टूटती जाती है। एक अनुमान के अनुसार जिलेभर में अब तक के पैंडिंग अपराधों में अधिकांश मामले सुसाइड के हैं, जिन पर खाकी की अधुरी तफ्तीश होने के कारण वे फाइलें थानों की आलमारियों में धूल चाटती नजर आ रही है।
बिते कुछ दशकों में आधुनिकता की चकाचौंध के चलते हर व्यक्ति का रहन-सहन बदला है और महंगाई व बेरोजगारी भी दिन-ओ-दिन पैर पसारती ही जा रही है। एसे में इंसान की उम्मीदें और शोक बड़े लेकिन आवक उतनी की उतनी ही होने से हर आदमी अपने आपको सोसायटी मेें जीवीत रखने के लिए एक नकली जीवन जी रहा है और जब इसी नकली जीवन और असली जीवन के दो पाटों में वह तबियत से पीसने लगता है तो अंतत: उसे आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ता है। बात यदि आत्महत्या के बाद थानों पर मर्ग दर्ज होने से प्रारंभ होने से प्रारंभ होने वाली खाकी की पड़ताल की करें तो शुरू के 12 दिन तो खाकीदार यह कहकर मामले को टालने के प्रयास में लगते हैं कि अभी तो परिवार का माहोल ग़मज़दा है। खैर ये लाज़मी भी है, लेकिन इसके बाद वाकई में जो पड़ताल होना चाहिए होती है वो अधिकांश मामलों में नहीं हो पाती। जबकि मरने वालों के परिजनों को ये उम्मीद पुलिस से ही होती है, कि पुलिस जरूर उन कारणों तक पहुंचेगी, जिससे उनके घर का एक आदमी काल के गाल में समा गया। सूत्रों पर भरोसा करें तो कई बार यह तक भी होता है, कि मामले के जांच अधिकारी परिजनों व मरने वाले के करीबियों के बयानों के आधार पर उन व्यक्तियों या कारणों तक भी पहुंच जाते हैं, जिनकी वजह से आत्महत्या की गई है, लेकिन इस तरह के आरोपियों से अच्छी खासी सांठ-गांठ कर मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है।
लाशें मांग रही इंसाफ
किसी ने अपना बेटा खोया, किसी मासूम ने पिता का साया गवां दिया, तो किसी पत्नी ने अपने सुहाग को उजड़ते देखा। ये सब होने के बाद इन पथराई आंखों में बस अब एक ही उम्मीद बची है, कि किसी तरह उनके चश्न-ओ-चिराग को इस दुनिया को विदा करने वाले आखिर कौन थे, किसी तरह पुलिस उन लोगों तक पहुंचकर उन्हें कड़ी सजा दिलवा दें। इस चक्कर में आज भी कोई बाप दिन का एक चक्कर थाने की दहलीज पर लगा रहा है, तो कोई कोई बाप रात-रातभर सो नहीं पा रहा है। किंतु एक भी आत्महत्या के मामले में पुलिस अब तक आत्महत्या के लिए प्रेरित करने वालों के गिरेबां तक नहीं पहुंच पाई है और पुलिस की फाईलों में सदा के लिए दफन हो चुकी ये लाशें चीख-चीखकर इंसाफ की गुहार कर रही है।
डेड़ साल में 150 आत्हमत्याएं
एक अनुमान के अनुसार जिले के 15 थानों में डेड़ साल में करीब 150 आत्महत्याओं के मामले हुए। लेकिन उन्हें इस राह में धकेलने वाले आज भी खुलेआम घुम रहे हैं। इक्का-दूक्का वो भी सुसाइड नोट बरामदगी के मामलों को छोड़ दें तो लोगों को मौत के मुंह में धकेलने वालों तक पुलिस नहीं पहुंच पाई है। इस बीच कभी आईपीएल क्रिकेट, कभी वल्र्ड कप क्रिकेट, कभी डब्बे के व्यापार के चलते भी कई जिंदगियां फांसी पर झूली।

कफन बेचती खाकी की पड़ताल
सूत्र बताते हैं, कि एसा कोई मामला नहीं जिसमें पुलिस निष्ठा से जांच नहीं करती। फर्क बस इतना है, कि जांच के बाजार में खाकी की निष्ठा कहीं न कहीं बिक ही जाती है। एसा ही कुछ आत्महत्या वाले मामलों में भी होता है, जिस जांच अधिकारी के पास मामलों की जांच जाती है। वे बाकायदा परिजनों से लेकर मृतक के सभी मिलने-जूलने वालों आदि के बयान करते हैं और उस व्यक्ति तक भी पहुंच जाते हैं, जो आत्महत्या का कारण बना है। किंतु जब वह आरोपी खुद को बचाने के लिए नोटो की खुश्बू बिखेरता हैं, तो उस खुश्बू के आगे लाशों का भी सौदा हो जाता है।
पारिवारिक क्लेश में महिलाएं और प्रेम प्रसंग में युवतियां
आत्महत्याओं के कई मामलों में इसलिए भी जांच निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाती है। क्योंकि कई बार मृतक के परिजन भी यह सोचकर ढीले पढ़ जाते हैं, कि यदि आत्महत्या के कारणों का खुलासा हुआ तो परिवार की प्रतिष्ठा को ठेंस पहुंचेगी। एसे अधिकांश मामले महिलाओं, युवतियों की आत्महत्या के होते हैं। क्योंकि अधिकांश महिलाएं पारिवारिक क्लेश के चलते मौत की राह चुनती है, जिसमें परिवार के ही लोगों पर कार्रवाई हो सकती है, तो वहीं युवतियां प्यार में फरेब जैसे मामलों में मौत को गले लगाती है। एसी युवतियों की आत्महत्या के कारणों का खुलासा हो तो परिजनों के मन में यह डर रहता है, कि परिवार की इज्जत का और अधिक पंचनामा बनेगा।
…लेकिन परिजन ता-उम्र हर लम्हा मरते हैं
जिले में होने वाले आत्महत्याओं के मामले में अधिकांश केस में एक बात समान है। वो ये कि अधिकांश मरने वालों ने मौत के लिए फांसी पर झूलना ही पसंद किया। मेडिकल साईंस की माने तो खुद को खत्म करने के लिए यह बिना ज्यादा तड़पे सबसे बेहतर रास्ता है। क्योंकि गले में ही एक वह नस होती है, जो दीमाग से निकलकर पूरे शरीर को नियंत्रित करती है। एसे में फंदे के दबाव में वह नस दबते ही इंसान चंद सैंकंड में काल के गाल में समा जाता है। हालांकि जो लोगों दुनियादारी से तंग आकर आत्महत्या जैसे कदम उठाने की बजाए दुनिया से लडऩा चाहिए। क्योंकि वे तो आत्महत्या करके अपनी परेशानियों से निजात पा लेते हैं, लेकिन उनके पिछे पूरा परिवार जिंदगी भर हर पल हर लम्हा मर-मर कर जीता है।
फाइल का खात्मा और जज़बातों का एंकाउंटर
अधिकांश आत्महत्या वाले मामलों में आत्महत्या करने के लिए उकसाने वालों को ले-देकर छोडऩे की खाकी की अन्य प्रकरणों की तरह आदत बन गई है। इसी तरह एक-एक करके जब इस तरह के प्रकरणों का बोझ थानों की आलमारियों पर बढ़ता जाता है, तो पैंडेंसी निपटाने के नाम पर परिजनों को कुछ तो भी बत्ती देकर मामले का खात्मा कर फाइल बंद कर दी जाती है और इस तरह एक परिवार के एक युग का एंकाउंटर थाने पर हो जाता है। अच्छा इस तरह की फाइलों से निजात पाने के लिए पुलिस के पास एक और रटा रटाया कारण यह भी है, कि मृतक की दीमागी हालत ठीक नहीं थी।

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