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जगह-जगह उग गई सब्जी मंडिया, आमजन परेशान

अस्थाई और बेतरतीब सब्जी मंडियों के चलते लग रहे पशुओं के जमघट, शहर को दो स्थाई और बड़ी खैरची सब्जी मंडियों की सख्त आवश्यकता

पालो रिपोर्टर = मंदसौर
यदि आपको जल्दी है और सब्जी भी साथ घर ले जाना है, तो कोई बात नहीं क्योंकि हमारा मंदसौर शहर तो अब धीरे-धीरे आलू, भींडी, गोभी, टमाटर का शहर बनता जा रहा है। जगह-जगह सब्जी-भाजी के ठेले दिख जाएंगे, तो वहीं संभाग का शायद यही अकेला एक शहर होगा, एक या दो नहीं करीब आधा दर्जन सब्जी मंडियां चल रही है। इन अस्थाई सब्जी मंडियों के चलते कई सारी असुविधाएं उन क्षेत्र के रहवासियों को झेलना पड़ रही है। जब तेजी से फैलते शहर को दो बड़ी और स्थाई सब्जी मंडियों की सख्त आवश्यक्ता है। एक गांधी चौराहा के उस पार बसने वाले नए शहर के लिए तो वहीं दूसरी गांाधी चौराहा के इस पार बसने वाले पुराने शहर के लिए।
बढ़ती जनसंख्या और आधुनिकत चकाचौंध में मंदसौर शहर भी तेजी से फैलता जा रहा है। पिछले दो दशकों में शहर की सीरत और सूरत दोनों का काफी बदली है। जिम्मेदार नपा प्रशासन ने भी शहर में व्यवसाईक क्षेत्रों का विकास किया, लेकिन सिर्फ उन्हीं व्यवसाईक क्षेत्रों का निर्माण हुआ, जिनकी नीलामी आदि में अच्छी खासी मलाई चाटने को मिल सके। जबकि छोटे और मझोले व्यापारियों के लिए कोई खास नपा अब तक नहीं कर पाई। नपा की इस बैरूखी का दंश न सिर्फ वो व्यवसाई झेल रहे हैं, बल्कि शहरवासियों को भी इनके द्वारा हर कहीं ठेला आदि लगाने से होने वाली परेशानी से दो-चार होना पड़ रहा है। एसा ही मामला फूटकर सब्जी विक्रेताओं का है। जो सुबह गौल चौराहा स्थित थोक सब्जी मंडी से माल लेकर निकल जाते हैं और अपनी मर्जी पड़े वहां ठेला या चादर बीछाकर सब्जी बेचना चालू कर देते हैं। हालांकि इनकी इसमें कोई गलती नहीं है। क्योंकि हमारे जिम्मेदारों ने इनको शहर में एक व्यवस्थित और स्थाई सब्जी मंडी दे ही नहीं रखी है तो बैचारे ये तो हर कहीं खड़े होंगे ही। क्योंकि इनके भी पेट लगे हुए हैं। जिन क्षेत्रों में अस्थाई सब्जी मंडी लगती है उनमें जीवागंज, नरसिंहपुरा तिराहा, अभिनंदन मेन रोड, गौल चौराहा से मुनीमजी पावबड़े वाली रोड, नेहरू बस स्टैंड, पंडित गजामहाराज शॉपिंग कॉम्पलेक्स के पिछे आदि क्षेत्र शामिल हैं।
जिंदगियां दाव पर
दूर से साधारण शोर-शराबे वाली दिखने वाली इन अस्थाई सब्जी मंडियों की एक काली सच्चाई यह भी है, कि इन सब्जी मंडियों में उट-पटांग दौडऩे वाले मवैशियों के कारण विगत सालों में अब तक कई जाने भी जा चुकी है। अकेली जीवागंज की सब्जी मंडी पिछले डेड़ दशक में करीब 3 जिंदगियों की बली ले चुकी है। बताया जाता है, कि इन तीनों मृतकों को सब्जी मंडी में मवैशी ने टक्कर मार दी थी, जिससे वे घायल हुए और बाद में उपचार के दौरान दम तोड़ दिया। तीनों बुजूर्ग बताए जाते हैं। इसी तरह शहर की अन्य अस्थाई सब्जी मंडियों में भी इस तरह के कई हादसे हो चुके हैं। आए दिन लोगों के हाथ-पैर टूटना तो सामान्य बात है।
अपराधों का भी डर
सूत्र बताते हैं, कि रहवासी क्षेत्रों में चलने वाली इन सब्जी मंडियों के भीड़-भड़क्के में असामाजिक तत्व भी इन क्षेत्रों में धीरे-धीरे अपनी बैठक जमा लेते हैं और बाद में यहीं की बहन-बेटियों को बहला-फूसलाकर भगा ले जाते हैं, तो वहीं सब्जी मंडियों में आने वाली महिलाओं पर फब्तियां कसते हैं। इसी तरह चैन स्नैचिंग, जेब कटिंग आदि की अपराध भी इन सब्जी मंडियों में आसानी से बिकते हैं।
घर के अंदर भी सब्जी बाहर भी
जिन क्षेत्रों में अस्थाई सब्जी मंडी लगती है। उन क्षेत्रवासियों के ये आलम हो चुके हैं, कि उनके घर में कढ़ाई में तो सब्जी होती ही है घर के आंगन से जब घर में आवाजाही करनी होती है तब भी सब्जी वाली से ही पाला पड़ता है। अल सुबह से शुरू होने वाली इन सब्जी मंडियों के शोर-शराबों और कच-कचवाड़े के चलते कई बार लोग काफी त्रस्त हो जाते हैं। बच्चों की पढ़ाई तो डिस्टर्ब होती ही है घर में यदि कोई बुजूर्ग बीमार हो तो उसके लिए भी ये एक बड़ा सर दर्द है।
परेशान कर देते हैं मवैशी
सुबह-शाम ये सब्जी विक्रेता इन रहवासी क्षेत्रों में सब्जी बेचकर निकल जाते हैं, लेकिन इनके रहते इन क्षेत्रों में मवैशियों की आवाजाही बढ़ जाती है, जो दिनभर क्षेत्रवासियों के लिए बड़ी परेशानी का कारण बने रहते हैं। खासबर बुजूर्गों और बच्चों के लिए ये कई बार प्राण घातक भी हो जाते हैं। इस भय से न तो बुजूर्ग अपने ही घरों के बाहर टहल नहीं पाते तो वहीं घर के बड़े भी बच्चों को घर के बाहर खेलने जाने की इजाजत देने में हिचकिचाते हैं।
गंदगी का साम्राज्य
रहवासी क्षेत्रों में सब्जी मंडियों की अन्य दिक्कतों के साथ ही एक बड़ी दिक्कत ये भी है, कि कई बार सुबह सब्जी बेचकर विक्रेता तो निकल जाते हैं, लेकिन अपने पिछे इन क्षेत्रों में सड़ी-गली सब्जियों की गंदगी छोड़ जाते हैं। इसी तरह मवैशियों के अपशिष्ट पदार्थ भी यहां पड़े रहते हैं। सब्जी विक्रेताओं द्वारा छोड़ी जाने वाली गंदगी के चलते कई बार रहवासियों और विक्रेताओं में तू-तू, मैं-मैं भी हो जाती है। यही तू-तू, मैं-मैं अंठस में तब्दील हो जाती है और मौका आने पर बड़े विवाद का कारण भी बनती है।
हम नहीं चाहते गरीबों के पेट पर लात पड़े

एसा नहीं है, कि दैनिक पाताललोक उक्त खबर प्रकाशित कर गरीब और मझोले सब्जी विक्रेताओं के पेट पर लात मार रहा है। बल्कि पालो इस खबर के माध्यम से नपा प्रशासन को आगाह करता है, कि बढते शहर में दुकानों और शॉपिंग कॉम्पलेक्स की निलामियों से मलाई खुब कमा ली अब इन छोटे और मझोले सब्जी विक्रेताओं के लिए भी इंदौर की तर्ज पर दो स्थाई और बड़ी सब्जी मंडियों शहर के अलग-अलग क्षेत्रों में विकसीत करे ताकि इनको भी अपना व्यवसाय करने के लिए रोज-रोज किसी के आंगन और दुकान के बाहर बैठने की गरज ना करनी पड़े। साथ ही उन रहवासियों और दुकानदारों को भी राहत मिल सके जहां ये बैठते हैं।

patallok

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