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समर वैकेशन में गूंज रहा चल छोटू ज्यूस ला…

बाल श्रम अपराध का पाठ पढ़ाने वाले एसी में फरमा रहे आराम और नाबालिग 45 डिग्री की तपन में बहा रहे पसीना
पालो रिपोर्टर = मंदसौर

स्कूलों का शोर-गूल थमते ही शहर के बाजारों में ए छोटू ज्यूस ला…, चल छोटू सामने वाली टेबल से चाय के खाली ग्लास ला… जैसी आवाजे तेज हो गई है। जी हां आप बिल्कुल ठीक समझे शहर के बाजारों में नाबालिगों से बिना किसी डर के दुकानदार काम ले रहे हैं और बाल श्रम का खोफ फैलाने वाले एसी में आराम फरमा रहे हैं। इन दो के बीच शहर में कई नाबालिग छोटू 45 डिग्री गर्मी में पसीना बहाने का मजबूर हो रहे हैं।
गर्मी की छुट्टियां आ गई है, जिनके अभिभावक सक्षम थे वे समर वैकेशन पर निकल गए और जिन बच्चों के अभिभावक दो जून की रोटी के लिए दिन रात मेहनत कर रहे हैं, वे शहर के बाजारों में अपनी गर्मियों की छुट्टियों का सौदा कर बैठे हैं। जी हां ये मेरे शहर का एक कड़वा सच है, जो हर किसी को तो दिख रहा है, लेकिन शायद बाल श्रम अपराध के नाम पर दुकानदारियां करने वालों की आंखों पर नोटों की पट्टी चढ़ी हुई है। शहर में धड़ल्ले से नाबालिगों से काम लिया जा रहा है और कार्रवाई करने वाले मच्च गर्मी में अपने ऑफिसों पर एसी की हवा खा रहे हैं। ये दोलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो भले छीन लो मुझ से मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो बचपन की यादें वो कागज़ की कष्टी वो बारीश का पानी… मशहुर शायर सुदर्शन फाकिर की लिखी ये पंक्तियां वाकई हर इंसान को अपना बचपन याद दिला देती है, लेकिन शहर के बाजारों में जो दिख रहा है वो इसके ठीक विपरित हो रहा है। जी हां ता उम्र इंसान जिस बचपन को वापस लौटाने की जि़द भगवान से करता है, उसी बचपन को शहर के हजारों बच्चे मोटी चमड़ी वाले सेठों के यहां चंद रूपयों के लालच में काम करके जीवन की आपाधापी भरी भट्टी में जला रहे हैं। खैर उन बच्चों की तो अपनी कुछ मजबुरी रही होगी, लेकिन बाल श्रम अपराध के नाम पर नौटंकी करने वाले अनेक महानुभाव और खुद श्रम विभाग न जाने कहां खोया हुआ है, जो शहर में बाल श्रम रोकने को लेकर कार्रवाईयां होना ही बंद हो गई है। सुना तो यह भी है, कि विभाग के कारिंदों को बाल श्रम वाली दुकानों से हर महिने अच्छी-खासी बंदी आ जाती है, तो फिर क्यों कोई एसी भीषण गर्मी में एसी की हवा छोड़कर बाजार में कार्रवाई करने की ज़हमत उठाएगा।
श्रम कानून के नाम पर दुकानदारी भी
बता दें, कि बाल श्रम अपराध का ढींढोरा पीटकर अपनी जेबे भरने वाले भी शहर में एसे अनेक दल्ले हैं, जो अपने आपको समाजसेवी बताते हैं। जबकि इनकी असलियत यह है, कि इन्हें आपने यदि किसी संस्था पर चल रहे बाल श्रम की शिकायत कर दी तो समझों इनके वारे-न्यारे हो गए। मामले की तह तक पहुंचे तो शिकायत मिलने पर ये लोग पहले तो संबंधित संस्था संचालक को चमकोमाईसीन देकर उसकी जेब ढीली करवाएंगे। इसके बाद उस बाल श्रमिक को ले जाकर श्रम विभाग के समक्ष पेश करेंगे और उसके नाम से मिलने वाली सुविधाओं को स्वयं भोग करेंग और बाद में फिर उसे बाल श्रमिक को छोड़ देंगे भूख-प्यास से भरी इस दुनिया में दर-दर की ठौकरें खाने को। बाल श्रम के नाम पर अपनी दुकानदारी सेट करने वाले एसे समाजसेवियों को भी सरे बाजार जूते पढऩे चाहिए।
कम तन्ख्वा में मान जाते हैं
शहर के दुकानदारों, ढाबा संचालकों, फैक्ट्री मालिकों, चाय होटल संचालकों आदि की पहली पसंद नाबालिग स्टॉफ इसलिए भी होता है। क्योंकि कम उम्र के इन बच्चों की अधिका आकांशाएं नहीं होती है और इस उम्र में जोशी-जोश में ये बच्चे कई बड़े काम भी कर देते हैं। एसे में कम पगार में बड़ा काम करवाने की लालच में शहर के कई धन्ना सेठ जो खुद के बच्चों को तो बड़े शहरों में समर वैकेशन भेजेते हैं और इन नाबालिगों का हम्मालों की भांति शोषण करते हैं।
बुरी संगत का डर इसलिए काम
एसा नहीं है, कि हर अभिभावक असक्षमता के चलते समर वैकेशन में अपने बच्चों को दुकानों पर काम करने भेजते हैं, बल्कि इसके पीछे उनकी मंशा यह भी होती है, कि बच्चा फ्रि रहेगा तो बुरी संगत में पड़ जाएगा। किंतु उसे बुरी संगत से बचाने के लिए कहीं काम पर भेजना मतलब सीधे-सीधे बच्चे की पढ़ाई भी प्रभावित करना होता है। क्योंकि जहां वह काम पर जाता है, वहां से प्रतिमाह मिलने वाले चंद रूपए उसके लालच का कारण बनते हैं और धीरे-धीरे पढ़ाई से उसका ध्यान हटकर किसी न किसी दुकान पर गुलाम की करने की ओर बढ़ता चला जाता है।
वजन तक उठवाते हैं नाबालिगों से
आपको शायद जानकर आश्चर्य होगा, कि शहर में नाबालिगों से काम लेने की परंपरा न सिर्फ कपड़ों, जूतों की दुकानों, चाय की होटलों तक ही सिमित नहीं है बल्कि शहर की कई कॉलोनियों में चल रहे मकान निर्माण में तक नाबालिगों से तगारियां तुकवाई जा रही है। यहां तक की शनिवार को धानमंडी में एक नाबालिग बालक हाथ ठेला चलाते हुए पाया, जिसका पालो के फोटो जर्नलिस्ट ने अपने कैमरे में चित्र कैद कर लिया। इधर, सूत्र बता रहे हैं कि नाबालिगों से काम का खेल सुबह-सुबह होलसेल सब्जी मंडी, फूल मंडी तक में लिया जा रहा है, तो वहीं शहर की कृषि उपज मंडी के गौदामों और औद्योगिक क्षेत्र की कई फैक्ट्रियों में भी बाल श्रमिक दिख जाएंगे।
ये भी अच्छी नोटंकी है
शहर की कई फैक्ट्रियों, चाय की होटलों, बड़े-बड़े रेस्टोरेंट्स आदि संस्थानों पर एक नोटिस नौटंकी अवश्य मिलती है, जहां लिखा रहता है यहां बाल श्रमिकों से काम नहीं लिया जाता है। जबकि यदि ढंग से इन संस्थानों की छानबिन की जाए तो किसी के गौदाम में तो किसी के किचन में बाल श्रमिक मिल ही जाएगा और तो और इन बाल श्रमिकों को भी सीखा-पढ़ा दिया जाता है, कि कोई भी उम्र पूछे तो 14 साल से उपर बताना। एसे में यहां बाल श्रमिकों से काम नहीं लिया जाता है, कि जगह यहां बाल श्रमिकों से भी काम लिया जाता है की बोर्ड होना चाहिए। श्रम विभाग को चाहिए कि खासकर शहर के हाय-फाय होटलों, ढाबों आदि का ढंग से निरीक्षण करें।
खुद के बच्चों को आइस्क्रीम
जो अभिभावक अपने बच्चों किसी भी कारण से लोगों यहां काम पर भेजते हैं, वे जान लें कि उन बच्चों के साथ उनके सेठ किस कदर शोषण करते हैं। जिस गर्मी की छुट्टी में उन्हें नाना से चॉकलेट, आईस्क्रीम की जीद करना होती है या दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलना होता है उस गर्मी में मालिक उनसे अपनी गाड़ी साफ करवाता है, पूरी दुकान का झाडू़-पौछा लगवाता है, खुद के बच्चों के लिए आईस्क्रीम उन नाबालिगों से मंगवाता है और उन्हें देता तक नहीं। और तो और कई मालिक तो इतने अल्लाम होते हैं जो रविवार के दिन भी दुकान की सफाई के बहाने इन नाबालिगों पर काम को बोझ ढोते हैं।

patallok

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