NEWS :

नाना बारका रा ब्याव मंडी रया है गामड़ा में…!

अक्षय तृतीया पर अंचल में जमकर फन फैलाएगा बाल विवाह का नाग
हर साला जमीनी हकीकत से परे साबित होते हैं महिला एवं बाल विकास विभाग के तमाम दावे
पालो रिपोर्टर = मंदसौर

कहने को भले ही राज्य व केंद्र की सरकारें बाल विवाहों पर प्रतिबंध के कई दावे कर ले, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी कुछ और बयां कर रही है। एक अनुमान के अनुसार अकेले अक्षय तृतीया वाली शादियों की सीजन में जिले में लगभग 200 से अधिक नाबालिगों को फैरे फिरवा दिए जाते हैं। अक्षय तृतीया के पास आते ही जिले में सैंकड़ों बालिका वधुओं को सजाने की तैयारियां प्रारंभ हो गई है। मालवी भाषा में कहें तो गाम-गाम में नरा नाना बारका रो ब्याव मंडेगा।
इन दिनों छोट्या थारा ब्याह में नाचूंगी रे घुमर घाल ने… वाला क्षेत्रिय भाषा का यह गीत हर शादी में सुनने को मिल रहा है। असल में यह गाना ग्रामीण क्षेत्रों की उन शादियों में बिल्कुल सच साबित हो रहा है, जहां नाबालिग छोट्या का ब्याह में भाभी घुमर कर रही है। बाल विवाह के प्रतिबंध में पलिता लगाने में महिला एवं बाल विकास विभाग के मैदानी कर्मी भी कोई कौर कसर नहीं छोड़ते। सूत्र बता रहे हैं, कि ग्रामीणांचलों में तैनात विभाग के नुमाईंदें नोटों की खुश्बू के चक्कर में बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीति की दुर्गंध को रोकने में अक्षम साबित हो रहे हैं। 7 मई को अक्षय तृतीया है, बताया जाता है, इस दिन सबसे अधिक बाल विवाह चोरी-छूपे किए जाते हैं। इनमें से 90 प्रतिशत मामले वो होते हैं, जिनमें नाबालिग बच्चियां पढ़-लिखकर देश का भविष्य उज्जवल करना चाहती है, लेकिन अभिभावक असाक्षरता के चलते कलम पकडऩे वाले हाथों को समय से पहले पीला कर देते हैं। एसे मामले अक्षय तृतीया के आसपास इसलिए अधिक होते हैं। क्योंकि इस समय किसान लगभग फूरसत में होता है और अधिकांश शादियां ग्रामीणांचलों में ही होती है। महिला एवं बाल विकास विभाग इनमें से सिर्फ 25 मामले ही पकड़ पाता है। बालिका वधु के बाद उड़ान, सत्यमेव जयते, क्राईम पेट्रोल, सावधान इंडिया जैसे अनेक सीरियल ने इन दिनों टीवी पर लोगों की जान बने। खास बात यह है, कि ग्रामीण जनता भी इन्हें बड़े चाउ से देखती है। किंतु यह दिवानगी महज टीवी तक ही सिमित रहती है। क्योंकि बावजूद इसके बाल विवाह बदस्तुर जारी है।
मुखबीरों पर जान का खतरा
महिला एवं बाल विकास विभाग की टीम द्वारा महज करीब 25 मामले सालाना बाल विवाह के पकडऩा इस और भी ईशारा करते हैं, कि या तो इस शहरी टीम के ग्रामीणांचलों में होने वाले बाल विवाहों का मुखबीर तंत्र कमजोर है या फिर ग्रामीण क्षेत्रों में विभाग के मैदानी कर्मचारी और अधिकारी ही बिकाउ हैं। सूत्र बताते हैं, कि यदि आयोजकों को विभाग के मुखबीर तंत्र का पता चल जाए तो कई बार संबंधित मुखबीर की जान पर भी बन आती है।
जड़ से खत्म होने में अब भी देर
कभी देशभर में यह कुरीति एक परंपरा हुआ करती थी, लेकिन साक्षरता के उजाले ने इसे कम तो किया है किंतु जड़ से नहीं मिटा सका। इस मामले में हुए तमाम सरकारी प्रयास भी अब तक लगभग विफल ही साबित हुए हैं। इसका प्रमुख उदाहरण पड़ोंसी प्रदेश राजस्थान है, जहां आज भी कई क्षेत्रों में धड़ल्ले से बाल विवाह होते हैं और यहां तक कि ग्रामीण लोग आज भी इसे एक परंपरा ही मानते हैं। जबकि मप्र में भले ही यह परंपरा नहीं हो, लेकिन आज भी इसका प्रचलन ग्रामीण क्षेत्रों में जारी है।
सैय्या भए कोतवाल तो डर काहे का
बाल विवाह जैसे घीनौने अपराध की तह तक पहुंचे तो सूत्र बताते हैं, कि इतनी जागरूकता होने के बावजूद कई ग्रामीण क्षेत्रों में बाल विवाह इसलिए भी आसानी से निपट जाते हैं। क्योंकि परिजन पहले से सभी मैदानी कर्मचारियों को खरीद लेते हैं। बताया जाता है, कि इस मामले में मुंह बंद रखने के कोटवारों से लेकर आशा कार्यकर्ताओं तक को परिजन अच्छी खासी रकम देते हैं। बस फिर क्या सैय्या भए कोतवाल तो डर काहे का वाली तर्ज पर बाल विवाह की शहनाईया गांव की चौपाल पर जमकर गूंजती है।
इन बालिकाओं ने किया था विरोध
बाल विवाहों के मामले में शहर भी पिछे नहीं हैं। विगत कुछ सालों को रिकॉर्ड खंगालें तो शहरी क्षेत्र में भी समय-समय पर एसे मामले सामने आए हैं। अभी कुछ साल पूर्व ही कोतवाली पुलिस ने नरसिंहघाट गली जनकूपुरा की एक किशोरी की शिकायत पर कार्रवाई की थी। किशोरी की शिकायत थी, कि परिजन जबरन 5 साल पूर्व उसका बाल विवाह करवा दिया था और अब उसका गौना करवा रहे हैं। इसी तरह इसके पूर्व में एक घटना बालागंज की सामने आई थी। इसमें महारानी लक्ष्मीबाई कन्या उमावि की एक छात्रा ने अपने परिजनों के खिलाफ बाल विवाह करवाने की शिकायत की थी।
शिक्षितों से दूरी
सूत्र बताते हैं, कि अपने घर में बिना विध्न के बाल विवाह आसानी से निपट जाए। इसके लिए कई परिजन तो इस हद तक गिर जाते हैं, कि वे अपने किसी पढ़े-लिखे रिश्तेदार को इस शादी का न्योता तक नहीं देते। परिजनों को इस बात का डर होता है, कि कहीं शिक्षित रिश्तेदार शादी की बैंड न बजा दे।
…ताकि बहू अपने भावी जीवन को समझ ले
पालो रिपोर्टर ने जब कुछ ग्रामीणों से बाल विवाह पर उनकी राय जानी तो उनका कहना था, कि यह हमारे बुजूर्गों द्वारा चलाई गई एक प्रथा है, जिसका मुख्य कारण यह रहता है, कि आपके घर में जो बहू आ रही है वह कच्ची उम्र से ही समझ ले कि उसे किस घर में जाना है और वहां के तौर-तरिके क्या है। उसके पति व अन्य ससुराल वालों स्वभाव कैसा है। इससे उसे भावी ससुराल में घुलने-मिलने में अधिक परेशानी नहीं आती और शादी के बाद पसंद-ना पसंद से उपजने वाले तलाक तक के बड़े मामले पनप नहीं पाते।

patallok

leave a comment

Create Account



Log In Your Account