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प्रयास जारी है जड़ मति होत सुजान के

फेस -टू- फेस
तीन पीढिय़ों की मशक्कत का मिजाज है रॉयल ऑप्टिकल

रॉयल ऑप्टिकल के मालिक वासुभाई खेमानी संघर्ष और जिंदादिली की मिसाल हैं, अपने परिवार के सिंध पाकिस्तान की जमीदारी से वर्तमान तक के सफर को उन्होने दैनिक पाताल लोक से साझा किया कॉलम फेस टू फेस के लिए वासुभाई बताते हैं की वो छ: महीने के थे जब जोधपुर से उनका परिवार मंदसौर आया था।
17 साल की उम्र में वो रेडिओ रिपेयरिंग का काम सीखने बाहर चले गए थे एक दिन पिताजी का टेलीग्राम आया की सब काम छोड़ कर मंदसौर आ जायें और चश्में की दुकान सम्हाले, तब ये दुकान उनके बड़े भाई हरिकिशन चलाते थे, चश्मे की इस दुकान में आमदनी और बड़े भाई की रूचि दोनों कम थी।
तब मंदसौर के लोगों को चश्मा सुधरवाने इंदौर जाना पड़ता था, वासुभाई ने सोचा वो चश्मे से संबंधित सब काम मंदसौर में करेंगे अपने हुनर को तराशने वे हर शनिवार बड़ौदा जाते और चश्मा रिपेरिंग का काम सीखते, फिर उन्होने अपने भाई को भी विशाखापटनम से शिप की नौकरी छुड़वा कर अपने साथ काम करने के लिए बुला लिया। वासु भाई की मेहनत रंग लाई और मात्र दो बरस यानी 1969 रॉयल ऑप्टिकल स्थापित हो गया।
सेवा है सर्वोपरि: वासुभाई कहते हैं उन्होने सेवा को सबसे ऊपर समझा, उनकी दुकान पर तब प्रचलित फाउंटेन पेन में मुफ्त स्याही भरी जाती थी और विद्यार्थी इसका लाभ उठाते थे।
हमेशा से रहे अपडेट: वासुभाई चश्मे के धन्दे में हमेशा नई तकनीक को लेकर अपडेट रहे 1991 में वे आई टेस्टिंग की जो मशीन लाए वो पूरे प्रदेश में मात्र तीसरी थी। इसी तरह उन्होने रे बेन सहित गॉगल्स के लगभग सभी ब्रांड्स की डीलरशिप ली। उन्होने ओप्तोमीतर की ट्रेनिंग अपने बेटे और पोते को नासिक से दिलवाई। उन्होंने अपने हाथ से सबसे महंगा गॉगल्स 13000/का बेचा जब की उनके पोते रोहित और देवेश इससे कई गुना कीमत के चश्मे बेचते रहते हैं, वासुभाई गर्व से कहते हैं की उनके पोते इस फील्ड के मास्टर बन चुके हैं।
चले सीधी राह पर: वासुभाई ने बिजऩस में गलत राह कभी नहीं पकड़ी, वो कहते हैं काम चलता है तो नाम चलता है, वे खुश है कि आज अंचल में रॉयल ऑप्टिकल का नाम सही काम और सही दाम के लिए जाना जाता है वासुभाई आवश्यकता पडऩे पर चश्मा रिपेयर कर होम डिलेवरी भी करते है।
माँ के संस्कार: दुखी सुखी की मदद करने का जज्बा उन्हे अपनी माँ से मिला है, उनकी दुकान से कोई जरूरतमंद खाली नहीं गया।
सेवा का भाव: वासुभाई लायंस क्लब और सिंधी समाज के संरक्षक के रूप में अनेक सेवा कार्य करते रहे हैं, समाज को नई राह उन्होंने तब दिखाई जब अपने जवान बेटे की दुखद मौत के बाद उन्होने अपने हाथों से बहू को डोली में बिठा कर विदा किया, जो आज खुशहाल जीवन जी रही है।
आज जब बासु भाई की पोती उन्हें कहती है की दादू आपने बहुत सही किया तो उन्हें लगता है अब जीवन में पाने के लिए कुछ बाकी नहीं रहा।

patallok

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