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मशक्कत के बीहड़ में ‘नारूÓ की सेर

फेस -टू- फेस
अभावों के साये में तदबीर से बनाई तकदीर

मेहनत इमानदारी और सब्र सफलता के यही मंत्र है ऊपरवाला भूखा उठाता जरूर है पर भूखा सुलाता नहीं मेहनत व सच्ची लगन से सब कुछ संभव है यह कहना है नाहरू खान का जो अपने जज्बे और कोशिशों से अपनी कमजोरियों को याने की स्कूली शिक्षा ना होने को पारकर विजय की नई नई गाथाएं लिख चुके है। दैनिक पाताल लोक ने नाहरू भाई को इस सप्ताह चुना है अपने कॉलम फेस टू फेस के लिए नाहरू भाई मिसाल हैं उन लोगों के लिए जो जिंदगी में मुसीबतों अशिक्षा और लोगों के अड़ंगे को अपनी नाकामयाबी छुपाने के लिए ढाल बनाते है। एनके इंजीनियर्स एंड इलेक्ट्रिकल्स के मालिक हो कर आज नाहरू खान की फैक्ट्री में लगभग 25 कर्मचारी कार्यरत हैं। जहां वे 5 क्वालिटी की ग्रेडिंग मशीन बनाते हैं साथ ही उनका साइलेंट जनरेटर का असेम्बलिन्ग लगभग पूरे देश में लोकप्रिय हुआ।
अपने ना पढ़ पाने पर क्या उन्हें अफसोस होता है यह पूछे जाने पर नाहरू भाई हंस कर कहते हैं शायद पढ़ा लिखा होता तो इतना न कर पाता। वह याद करते हैं जब अपनी मां हलीम बाई के साथ वह जंगल से घास के पूले काट कर लाते थे और उन्हें बेचकर ही एक वक्त की रोटी का मिलना संभव हो पाता था। 8 साल की उम्र से ही नाहरू खान को परिवार के लिए संघर्ष करना पड़ा। स्टेशन पर स्थित भट्टर जी की दुकान पर उन्होंने ठेले पर पूरी सब्जी बेची। वहीं पर निर्मल साइकिल की दुकान पर भी उन्होंने 5 साल काम किया। उसके बाद गणेश साइकल पर 2 साल काम किया फिर चौधरी इलेक्ट्रिक डेकोरेशन एवं साइकिल की दुकान पर उन्होंने 16 साल तक काम किया। रेणुका स्टील और फेरो मैटल से होता हुआ उनकी मशक्कत का सफर सागर पहुंचा। जहां जाने के लिए उनकी जेब में किराया भी ना था लिहाजा 80 रूपए में पंखा गिरवी रखकर सागर पहुंच गए। वहां पर एक बर्तन की फैक्ट्री में काम करते हुए उनकी एक उंगली भी कट गई तभी उनसे मिलने आए हुए राधेश्याम पार्टनर इस बात पर नाराज और भावुक होकर उन्हें वापस मंदसौर ले आए।
नाहरू भाई बताते हैं उनकी कामयाबी में भाई राधेश्याम पार्टनर का बहुत बड़ा योगदान है। आज इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अपना मकाम बना चुके नाहरू भाई अपने जीवन से बेहद संतुष्ट हैं। उनका कहना है ईश्वर ने अच्छे लोगों को पैदा करने में कोई कमी नहीं की। उन्हें शुरू से ही जीवन में सहयोग मिला है और अपनी सफलता का श्रेय वो इन्हीं लोगों को देते हैं। उनके समाज में भी नाहरू भाई की अपने इन्हीं गुणों को लेकर बेहद इज्जत है। उनके बुजुर्ग फरमाते हैं कि नाहरू खान ने अन्य समुदायों के साथ प्रेम और सद्भाव का एक पुल तैयार किया है।
थोड़े दिन पहले ही नाहरू भाई ने पशुपतिनाथ मंदिर में लगभग साढ़े 3 लाख रूपए का जनरेटर दान किया है। वह कहते हैं मंदिर-मस्जिद हिंदू-मुसलमान मैं उन्हें तो कोई फर्क नजर नहीं आता। उन्होंने पशुपतिनाथ के मेले में भी लाइटिंग लगाई है और नाहर सैयद दरगाह के मेले में भी धार्मिक कार्यक्रमों में ही उन्होंने ज्यादा काम किया। अपने साइलेंट जनरेटर के लिए नाहरू खान को अनेक पुरूस्कार भी प्राप्त हुए हैं और उनकी प्रसिद्धि का एक कारण साइलेंट जनरेटर भी रहा है।
अपनी जिंदगी में अपनी मां को उन्होंने हमेशा सबसे ऊपर माना है। आज भी वे कोई भी नया काम अपनी मां के नाम से ही शुरू करते हैं। नाहरू भाई ने वो जमाना भी देखा है जब परिवार के लिए एक समय का भोजन जुटाना उनके लिए बड़ी मशक्कत का काम था और आज इनकी फैक्ट्री में 25-30 लोग काम करते हैं और उनका परिवार नाहरू भाई की वजह से चल रहा है। नारू भाई कहते हैं कि दुनिया अच्छे लोगों से भरी पड़ी है और वे इसके लिए ईश्वर को धन्यवाद देते नहीं थकते।

patallok

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