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भू-माफियाओं के दुष्कर्म को भेद पाएगा प्रशासन का चक्रव्यूह?

मामला 60 करोड़ की सरकारी भूमि का
मंदसौर। स्टेशन क्षेत्र की सोना उगलने वाली ८२५ आरी यानि लगभग पोने चार बीघा जमीन के एक मामले में पर्दे के पीछे खड़ी भू-माफियाओं की गेंंग ने ऐसा चक्रव्यूह खड़ा कर दिया है कि एक बार प्रशासन भी चकमा खा गया। धार्मिक स्थल की यह सरकारी भूमि भू-माफियाओं ने पुजारी से खरीद फरोख्त की थी जिसे वैधानिक रूप से नकारा जा रहा है? बावजूद इसके इस भूमि के मकडज़ाल में राजस्व स्टाम्प ड्यूटी की जमकर चोरी भी हुई है।
६० करोड़ का सौदा
सूत्रों पर भरोसा किया जाए तो यह भूमि लगभग ६६ हजार स्क्वायर फीट बनती है जिसका बाजार भाव कम से कम ६० करोड़ रूपया आंका जा रहा है, जबकि इसकी खरीदी भी ओने-पोने दामों में बताई जाकर भ्रम की स्थिति फैलाई गई। अण्डर ग्राउण्ड भू-माफियाओं की गेंग सर्वदमन की यह जमीन पुजारी से खरीदी जाने के बाद नामंत्रण आदि कार्यवाही को लेकर प्रशासन के प्रकाश में आया तो इस मामले को न्यायालय में ले जाया गया, जहां सर्वदमन की इस भूमि के मामले में न्यायालय ने दो बार प्रशासन के पक्ष में फैसला दिया।
सर्वदमन पटेल
पुजारी मंगलदास बैरागी ने यह भूमि सर्वदमन पटेल को बेची जबकि यह भूमि पशुपतिनाथ ट्रस्ट की थी, कालांतर में ऐसी जमीने शासकीय रिकार्ड में पुजारी के नाम से दर्ज हुआ करती थी, बाद में ऐसी जमीने कुछ पुजारियों ने बेचना शुरू कर दी तो ऐसे कई प्रकरण शासन-प्रशासन के सम्मुख आए, इसके बाद शासन ने ट्रस्ट एवं मंदिरों की जमीन का मालिक पदेन कलेक्टर को मुकर्रर कर दिया, इसके बाद ट्रस्ट या मंदिर की ऐसी भूमियों के जर्ये पुजारी द्वारा विक्रय, निर्माण, लीज, हस्तांतरण सहित किसी भी प्रकार के फेरबदल पर रोक लगा दी गई लेकिन हुआ यह कि बेशकीमती ट्रस्ट एवं मंदिरों की जमीन कुछ पुजारियों ने पटवारी और राजस्व अमले से जोड़ तोड़ कर अपने नाम चढ़वा ली और वे ऐसी जमीनों के मालिक बन बैठे, इसके बाद शासन-प्रशासन सचेत हुआ तो ऐसे कुछ मामले घिराये जबकि कुछ मामलों में कानूनी पेचिदगियों का लाभ उठाकर पर्दे के पीछे से भूमाफिया करोड़ों का खेल खेलने के लिये चौसर बिठाये जा रहे है।
सर्वदमन की इस भूमि के मामले में न्यायालय के आदेश के अनुसार नामंत्रण आदि होना इसलिए भी आवश्यक हो गया है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई समयावधि में यह कार्य होना है, इस मामले में हायकोर्ट में संबंधित राजस्व अधिकारी की व्यक्तिगत हाजरी भी लगवाई, ऐसे मामलों में ऐसा कम ही होता है। इधर सूत्र बताते है इस मामले में कलेक्टर, एसडीएम एवं तहसीलदार इस भूमि को लेकर कमर कस चुके है और भोपाल में पुन: पीटीशन लगाने से लेकर एसएमपी तथा एसएलपी, एडवोकेट जनरल से सम्पर्क करते हुए सुप्रीम कोर्ट तक जाने की तैय्यारियां है।
ये हुआ अब तक सर्वदमन की भूमि में
इस मामले में प्रशासन गंभीर है उसने अग्रीम कार्यवाही को लेकर सुप्रीम कोर्ट से एसएलपी की कॉपी मांगी वहां से जानकारी मिली कि इस प्रकरण के रिकार्ड में एसएलपी कॉपी नहीं है। इसके बाद कलेक्टर द्वारा सुप्रीम कोर्ट के शासकीय अभिभाषक के पास उपलब्ध रिकार्ड के आधार पर एसएलपी की प्रति प्रस्तुत करने को कहा… शासकीय अभिभाषक द्वारा संतोषप्रद जवाब नहीं मिलने की स्थिति में शासन के विरूद्ध हायकोर्ट में याचिका लगाई गई और अगस्त १८ को आदेश पारित हुआ कि उक्त जमीन का नामंत्रण दो माह में किया जाए। तत्कालीन तहसीलदार ब्रह्मसिंह श्रीवास्तव ने नामंत्रण कि यह प्रक्रिया इसलिए निरस्त कर दी कि शासन इस मामले में एसएलपी की प्रति प्रस्तुत करने जा रहा है इस कारण को लेकर नामंत्रण नहीं किया जा सकता।
तहसीलदार के नामंत्रण निरस्त करने के विरूद्ध सर्वदमन वाले (पर्दे के पीछे के भू-माफिया) हायकोर्ट गये इस बार हायकोर्ट ने इस मामले में न सिर्फ ३ दिवस में नामंत्रण करने का आदेश दिया बल्कि तहसीलदार को आदेश न मानने की शर्त पर काम्पेवर करते हुए कार्यवाही करने की हिदायत भी दी।
अब ये होगा
सूत्र बताते है हायकोर्ट के आदेश के बाद नामंत्रण करने के आदेश सेट नामंत्रण की प्रक्रिया तो हो गई लेकिन इस मामले में प्रशासन ”नामंत्रण के आदेशÓÓ के विरूद्ध पुन: हायकोर्ट में अपील करने जा रहा है। जानकार सूत्रों की माने तो इस मामले में कलेक्टर, एसडीएम, तहसीलदार से लेकर कमिश्नर की रणनीति बन चुकी है कि शासकीय इस भूमि को न सिर्फ बचाया जाएगा बल्कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट जाना पड़े तो उसकी तैयारियां भी जा रही है।
सराहनीय पहल
प्रशासकीय अधिकारी जिस शिद्दत से इस मामले को फेस कर अंडर ग्राउण्ड भू-माफियाओं के मनसूबों पर पानी फेरने के लिये चॉक चौबंद लग रहा है इसमें कुछ ईमानदार अधिकारियों की प्रशासन-शासन के प्रति प्रतिबद्धता स्पष्ट परिलक्षित होती है। इस मामले में आगे कि कार्यवाही देखना दिलचस्प होगा।

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