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खंडहर बनते जा रहे जिले के अधिकांश उप स्वास्थ्य केंद्र

फ्लॉप शो साबित हो रही गांव में उपचार योजना
कहीं चिकित्सकों की कमी तो कहीं एक-एक पखवाड़े ताले तक नहीं खुल रहे
पालो रिपोर्टर = मंदसौर

नदी, नालों और तालाबों पर अतिक्रमण के किस्से तो शायद अब जिले के लिए पुराने हो गए हों, लेकिन नई बात एक और यह सामने आ रही है, कि भूमाफिया जिले के उप स्वास्थ्य केंद परिसरों की भूमियों को भी नहीं छोड़ रहे हैं। खैर यह आलम तो होना ही था, कि क्योंकि जिलेभर में लाखों की लागत से बने अधिकांश उप स्वास्थ्य केंद्र खंडहर में तब्दील होते दिखाई दे रहे हैं। इसका प्रमुख कारण या तो स्वास्थ्य विभाग की अनदेखी के चलते अधिकांश उप स्वास्थ्य केंद्रों पर एक-एक पखवाड़ेभर तक ताले नहीं खुलना कहा जा सकता है या स्वास्थ्य महकमे की घीसी-पीटी बीमारी चिकित्सकों की कमी।
गांव के गांव में प्राथमिक उपचार की सुविधा के लिए सरकार ने उप स्वास्थ्य केंद्र खोलने की योजना बनाई थी। किंतु चिकित्सकों की कमी और अन्य अव्यवस्थाएं इस योजना को कुछ इस कदर दीमक की तरह चाट गई कि आज ये हालात हो गए है कि जिले में कुल 197 उप स्वास्थ्य केंद्र है, लेकिन वहां उप उपचार की सुविधाओं के नाम कुछ भी नहीं। यहां पर साप्ताहिक टीकाकरण और विशेष अवसरों पर शिविर लगने के अलावा कुछ नहीं होता है। 70 फीसदी उप स्वास्थ्य केंद्रों का ताला कभी नहीं खुलता एवं चिकित्सकों की कमी के कारण वहां उपचार करने वाला भी कोई नहीं मिलता है। छोटी से छोटी परेशानी होने पर भी ग्रामीणों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या जिला अस्पताल तक ही आना पड़ता है। इसके कारण उप स्वास्थ्य केंद्र के नाम पर बने लाखों के भवन खण्डहर होते जा रहे हैं। इसके साथ ही अब अतिक्रमण भी होने लगा है। स्वास्थ्य केन्द्र परिसरों में लोग कपड़े सुखा रहे हैं। अधूरी व्यवस्था के कारण गांव में ही प्राथमिक उपचार मिलने की योजना फ्लॉप हो रही है।
जिला अस्पताल में 80′ ग्रामीण
जिला अस्पताल में प्रतिदिन मरीजों की भीड़ लगती है, इनमें से 80 प्रतिशत से अधिक लोग ग्रामीण क्षेत्रों के ही होते है। कारण यह है कि इन मरीजों को गांवों में बने उप स्वास्थ्य केंद्रों में प्राथमिक उपचार नहीं मिल रहा है। जिले के पांचों विकासखण्डो के ग्रामीण क्षेत्रों में यही हालात है। जिला स्वास्थ्य अधिकारी उप स्वास्थ्य केन्द्रों के बंद रहने के पीछे रूबेला अभियान में एएनएम की डयूटी लगना बता रहे हैं। वहीं उनका कहना है कि जल्द ही व्यवस्थाएं बेहतर हो जाएगी। जबकि वर्तमान में स्वाइन फ्लू जैसे रोगों का प्रकोप बना हुआ है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य की लचर व्यवस्था यह प्रमाणित करती है कि रोगों की रोकथाम के लिए विभाग गंभीरता नहीं बरत रहा।
कहीं कुड़ादान, तो कहीं सुख रहे कपड़े
जिले के उप स्वास्थ्य केंद्रों के लगातार बंद पड़े रहने से हालात यह तक हो गए हैं, कि कई उप स्वास्थ्य केंद्रों की दीवालों पर लोगों ने कपड़े सुखाने का स्टैंड बना लिया है, तो किसी स्वास्थ्य केंद्र के आसपास कुड़ा डाल-डालकर रोड़ी जैसी हालत कर दी है। इसी तरह सूत्र बता रहे हैं, कि कई ग्रामीण इलाकों में तो इन केंद्रों के खुले परिसरों पर भूमाफियाओं की गिद्ध नजरे भी पहुंचने लगी है।
कौन बचाएगा स्वाइन फ्लू से
इन दिनों स्वाईन जैसे घातक रोग का डर बना हुआ है, ऐसे समय पर भी स्वास्थ्य व्यवस्थाएं ध्वस्त ही पड़ी है। ग्रामीण क्षेत्रों में उपचार के नाम पर कोई सुविधाएं नहीं है। जिले के पांचों ब्लॉकों में 197 उप स्वास्थ्य केंद्र है। इनमें से लगभग सभी में चिकित्सकों की कमी है, वहीं 70 फीसदी से अधिक उप स्वास्थ्य केंद्र ऐसे हैं, जिनका ताला ही सप्ताह से लेकर 15-15 दिनों में भी नहीं खुलता है। अब स्वास्थ्य केन्द्र परिसरों में अतिक्रमण भी होने लगे हैं। उप स्वास्थ्य केन्द्रों पर चिकित्सक नहीं मिलने के कारण सिर दर्द, सर्दी जुकाम और बुखार होने पर लोगों को सीधे तहसील मुख्यालय पर या जिला अस्पताल के अस्पतालों में जाना पड़ रहा है।
क्या कहते हैं जिम्मेदार
महीने के पहले मंगलवार को टीकाकरण व अन्य दिनों में अलग-अलग कार्यक्रम होते हैं। 15 जनवरी से रूबेला अभियान चल रहा है। सभी एएनएम की अभियान में डयूटी लगी हुई है इसके कारण उप स्वास्थ्य केन्द्रों पर परेशानी हो रही होगी। कुछ ही दिनों में सभी उप स्वास्थ्य केन्द्रों पर व्यवस्थाएं हो जाएगी। जहां पर अतिक्रमण है वहां से अतिक्रमण हटाया जाएगा।
-डॉ. महेश मालवीय, सीएमएचओ, मंदसौर

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